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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चौथी यादव और श्रीराम की उम्रकैद बरकरार रखी, 1983 देवरिया हत्या कांड का फैसला

चौथी यादव एवं अन्य बनाम राज्य - इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 1983 के देवरिया हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी, 40 साल बाद चौथी और श्री राम की अपील खारिज की

CB News Desk
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चौथी यादव और श्रीराम की उम्रकैद बरकरार रखी, 1983 देवरिया हत्या कांड का फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुरुवार (11 सितम्बर 2025) को 42 साल पुराने मामले में फैसला सुनाते हुए देवरिया ज़िले के चौथी यादव और श्रीराम यादव की अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सज़ा सही है और सबूतों से अपराध पूरी तरह साबित होता है।

पृष्ठभूमि

मामला 6 मार्च 1983 का है। उसी दिन मृतक रामचन्द्र यादव की पत्नी किशोरा देवी ने थाना गौरीबाजार में रिपोर्ट लिखवाई थी। आरोप था कि पुराने ज़मीनी झगड़े और रंजिश के चलते चौथी यादव, श्रीराम यादव और उनके साथी पहुंचे और बम से हमला कर दिया। रामचन्द्र और उनका चचेरा भाई दीना नाथ उस समय हजामत करा रहे थे। बम लगते ही दीना घायल होकर गिर पड़ा जबकि रामचन्द्र भागते हुए ग़ुरहु की गन्ने की खेती में घुस गए। वहाँ से उन्हें घसीट कर निकाला गया और भाले से वार कर हत्या कर दी गई। बाद में लाश मज़हना नाले से बरामद हुई।

देवरिया की सत्र अदालत ने 1985 में अभियुक्तों को दोषी ठहराते हुए उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी, साथ ही दंगा और हत्या के प्रयास के लिए अतिरिक्त दंड भी दिया था। अपील के लंबित रहने के दौरान ही एक अभियुक्त बृजलाल यादव की मृत्यु हो गई, जिससे केवल चौथी और श्रीराम की अपील ही बची रही।

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अदालत की टिप्पणियाँ

न्यायमूर्ति राजीव गुप्ता की पीठ ने गवाहों के बयानों पर विस्तार से विचार किया। अदालत ने खासतौर पर घायल गवाह दीना नाथ के बयान पर भरोसा जताया।

पीठ ने कहा,

''घायल गवाह का बयान विशेष महत्व रखता है। दीना नाथ ने लगातार यह कहा कि श्रीराम ने बम फेंके और उसके बाद चौथी और बृजलाल ने रामचन्द्र का पीछा कर भाले से हत्या की। ऐसे बयान को छोटी-छोटी विरोधाभासों के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। ''

नाई पर्मानन्द का बयान भी घटना की पुष्टि करता पाया गया। वहीं पत्नी किशोरा देवी और अन्य ग्रामीण गवाहों के बयानों को अदालत ने ''देहाती गवाहों की स्वाभाविक गवाही'' मानते हुए स्वीकार किया।

डिफेंस ने दलील दी थी कि रामचन्द्र पहले से डकैत था और किसी अनजान ने उसकी हत्या कर दी। अदालत ने इसे निराधार बताते हुए कहा कि ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं दिया गया। मेडिकल रिपोर्ट में आई तकनीकी बातों को भी अदालत ने यह कहते हुए नज़रअंदाज़ किया कि प्रत्यक्षदर्शी गवाही का महत्व ज्यादा है।

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निर्णय

सभी दलीलों पर विचार के बाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत का फैसला बरकरार रखा। आदेश में कहा गया,

''अभियोजन ने यह साबित कर दिया है कि अभियुक्तों ने साझा मंशा से रामचन्द्र की हत्या की। दोषसिद्धि और सज़ा दोनों ही सही हैं। ''

इस प्रकार 1985 से लंबित अपील अब खारिज कर दी गई।

Case Tittle : चौथी यादव व अन्य बनाम राज्य

Case Number: आपराधिक अपील संख्या 2142 सन् 1985

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