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दिल्ली हाईकोर्ट ने 18 साल पुराने पारिवारिक विवाद में कानूनी वारिस की दोबारा जिरह की मांग खारिज की

हितेंद्र शौकीन बनाम राजन कुमार शौकीन एवं अन्य - दिल्ली उच्च न्यायालय ने पारिवारिक संपत्ति विवाद में हितेंद्र शौकीन की याचिका खारिज कर दी, फैसला सुनाया कि एक बार पूरा हो जाने के बाद उत्तराधिकारी जिरह दोबारा नहीं खोल सकते।

CB News Desk
दिल्ली हाईकोर्ट ने 18 साल पुराने पारिवारिक विवाद में कानूनी वारिस की दोबारा जिरह की मांग खारिज की

दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को श्री हितेंद्र शौकीन की याचिका खारिज कर दी। हितेंद्र, स्व. बल किशन शौकीन के बेटे और कानूनी वारिस हैं। उन्होंने एक पुराने पारिवारिक संपत्ति विवाद में दोबारा गवाह से जिरह करने का अधिकार मांगा था। जस्टिस मनोज जैन ने साफ कहा कि कानूनी वारिस सिर्फ़ मृतक की जगह आते हैं, वे नए सिरे से मुकदमे की प्रक्रिया शुरू नहीं कर सकते।

पृष्ठभूमि

मुकदमा साल 2007 में शुरू हुआ था, जब राजन कुमार शौकीन ने अपने रिश्तेदारों के खिलाफ दीवानी वाद दायर किया। बल किशन शौकीन भी इसमें प्रतिवादी थे और उन्होंने कई साल मुकदमे का सामना किया। 2019 तक उन्होंने गवाह से लंबी जिरह भी पूरी की।

जून 2021 में बल किशन की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी, बेटे और बेटियाँ कानूनी वारिस के रूप में मुकदमे में शामिल किए गए। इसके बाद नवंबर 2022 में जब राजन शौकीन की गवाही हो रही थी, हितेंद्र शौकीन ने फिर से गवाह से सवाल पूछने की इजाज़त मांगी। लेकिन ट्रायल कोर्ट ने कहा कि मृतक प्रतिवादी पहले ही यह अधिकार इस्तेमाल कर चुके थे, इसलिए वारिस को यह दोबारा नहीं दिया जा सकता।

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अदालत की टिप्पणियाँ

जस्टिस मनोज जैन ने सुनवाई के दौरान कई पुराने मामलों का हवाला देखा, जिनमें जगदीश चंदर चटर्जी बनाम श्री किशन और विद्यावती बनाम मन मोहन शामिल थे। लेकिन उन्होंने साफ किया कि इन मिसालों से हितेंद्र को कोई लाभ नहीं मिल सकता। इसके बजाय अदालत ने डाबर इंडिया बनाम मनीकांत डांग (2022) मामले का ज़िक्र किया, जिसमें कहा गया था कि वारिस मुकदमे को पीछे घुमा कर दोबारा शुरू नहीं कर सकते।

न्यायाधीश ने टिप्पणी की-

''याचिकाकर्ता केवल मृत प्रतिवादी के स्थान पर शामिल हुए हैं। उन्हें वहीं से कार्यवाही आगे बढ़ानी होगी, जहां उनके पूर्वज ने छोड़ी थी।''

अदालत ने यह भी कहा कि यदि हर वारिस को नया मौका दिया जाए तो मुकदमे अंतहीन खिंचते रहेंगे।

इसके अलावा अदालत ने यह भी नोट किया कि हितेंद्र ने 2021 में खुद से एक अतिरिक्त लिखित बयान दायर कर दिया था, जबकि इसके लिए अदालत से कोई अनुमति नहीं ली गई थी। इसलिए ट्रायल कोर्ट ने उसे रिकॉर्ड पर लेने से इनकार कर सही कदम उठाया।

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निर्णय

अंत में हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी। जस्टिस जैन ने कहा-

''इस अदालत को याचिका में कोई दम या सार नहीं दिखता। इसलिए यह याचिका निरस्त की जाती है।''

इस आदेश के साथ अब करीब दो दशक से चल रहे विवाद की सुनवाई पहले से दर्ज गवाही पर ही आगे बढ़ेगी और गवाह से नई जिरह नहीं होगी।

Case Title : हितेंद्र शौकीन बनाम राजन कुमार शौकीन एवं अन्य

Case Number : CM(M) 1797/2023 & CM APPL. 56818/2023

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