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जैविक पितृत्व निर्धारण का अधिकार निजता के दावे से अधिक महत्वपूर्ण है, सर्वोच्च न्यायालय ने डीएनए परीक्षण को बरकरार रखा

सुप्रीम कोर्ट ने पितृत्व विवाद में DNA टेस्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि पुत्र की अपने जैविक पिता की पहचान जानने और संभावित कानूनी अधिकारों की रक्षा का हित अधिक महत्वपूर्ण है। - चतुर्भुज प्रधान बनाम अमर प्रधान एवं अन्य।

CB News Desk
जैविक पितृत्व निर्धारण का अधिकार निजता के दावे से अधिक महत्वपूर्ण है, सर्वोच्च न्यायालय ने डीएनए परीक्षण को बरकरार रखा

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में पितृत्व (पिता होने) के विवाद से जुड़े मामले में DNA टेस्ट कराने के आदेश को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि मामले में जैविक संबंध का प्रश्न सीधे तौर पर विवाद का केंद्र है और उपलब्ध साक्ष्यों से इसका निश्चित उत्तर नहीं मिल सकता।

न्यायालय ने चतुर्भुज प्रधान की अपील खारिज करते हुए माना कि मामले में हितों का संतुलन अमर प्रधान के पक्ष में जाता है, जो स्वयं को चतुर्भुज प्रधान का पुत्र बताते हुए संपत्ति में हिस्सा मांग रहे हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

अमर प्रधान का दावा है कि उनका जन्म 10 सितंबर 1999 को हुआ और उनकी मां तथा चतुर्भुज प्रधान के बीच जनवरी 1999 में सहमति से संबंध बने थे। अमर का कहना है कि चतुर्भुज प्रधान उनके जैविक पिता हैं।

दूसरी ओर, चतुर्भुज प्रधान ने शुरू से ही इस दावे से इनकार किया है। पिछले दो दशकों में दोनों पक्षों के बीच भरण-पोषण सहित कई कानूनी विवाद भी चले।

वयस्क होने के बाद अमर प्रधान ने सिविल अदालत में एक वाद दायर कर यह घोषणा मांगी कि वे चतुर्भुज प्रधान के पुत्र हैं और इस आधार पर उनकी संपत्ति में एक-तिहाई हिस्से के हकदार हैं। इसी मुकदमे के दौरान ट्रायल कोर्ट ने DNA टेस्ट का आदेश दिया था, जिसे बाद में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा।

अदालत की टिप्पणियां

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने अपने फैसले में DNA टेस्ट से जुड़े पूर्व के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख किया। अदालत ने दोहराया कि DNA टेस्ट का आदेश सामान्य रूप से नहीं दिया जाना चाहिए और पहले यह देखना आवश्यक है कि क्या अन्य साक्ष्यों के आधार पर विवाद का समाधान संभव है।

हालांकि, अदालत ने कहा कि जहां पितृत्व का प्रश्न सीधे विवाद का विषय हो और अन्य साक्ष्य निर्णायक उत्तर देने में सक्षम न हों, वहां DNA टेस्ट आवश्यक हो सकता है।

पीठ ने कहा:

“जब अदालत के सामने DNA टेस्ट का प्रश्न आता है, तो यह देखना आवश्यक है कि क्या टेस्ट का परिणाम सीधे विवाद से जुड़ा है और क्या रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य साक्ष्य उसका विकल्प बन सकते हैं।”

अदालत ने पाया कि अमर द्वारा दायर सिविल मुकदमे का मुख्य उद्देश्य ही पितृत्व स्थापित करना है। ऐसे में जैविक संबंध का प्रश्न इस मामले का केंद्रीय मुद्दा है।

पीठ ने यह भी नोट किया कि चतुर्भुज प्रधान लगातार पितृत्व से इनकार करते रहे हैं और रिकॉर्ड पर ऐसा कोई अन्य साक्ष्य नहीं है जो इस विवाद का स्पष्ट और अंतिम समाधान दे सके।

निजता बनाम पुत्र के अधिकार

चतुर्भुज प्रधान ने यह भी दलील दी थी कि DNA नमूना देने के लिए उन्हें बाध्य नहीं किया जा सकता और ऐसा आदेश उनके निजता के अधिकार का उल्लंघन होगा।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में एक ओर चतुर्भुज प्रधान का निजता का अधिकार है, वहीं दूसरी ओर अमर का अपने जैविक पिता की पहचान जानने और संभावित कानूनी अधिकारों को स्थापित करने का हित है।

अदालत ने कहा कि यदि इस प्रश्न का कभी निश्चित उत्तर नहीं मिला तो अमर उन अधिकारों से वंचित रह सकते हैं जिनके वे हकदार हो सकते हैं।

पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा:

“हितों का संतुलन निश्चित रूप से अमर के पक्ष में है।”

फैसला

इन परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट द्वारा DNA टेस्ट का आदेश देने में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है।

अदालत ने चतुर्भुज प्रधान की अपील खारिज कर दी और संबंधित सिविल अदालत को DNA टेस्ट की तारीख तय कर आगे की कार्यवाही करने का निर्देश दिया। साथ ही लंबित सभी आवेदनों का भी निस्तारण कर दिया गया।

किसी पक्ष को लागत नहीं दी गई।

Case Details

Case Title: Chaturbhuj Pradhan v. Amar Pradhan & Anr.

Case Number: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 4016 of 2026

Judge: Justice Sanjay Karol and Justice N. Kotiswar Singh

Decision Date: May 29, 2026

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