सुप्रीम कोर्ट ने 1995 के कथित रिश्वत मामले में केंद्रीय उत्पाद शुल्क विभाग के अधिकारियों को मिली राहत बरकरार रखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार की अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि भ्रष्टाचार के मामले में दोषसिद्धि के लिए रिश्वत की मांग और उसकी स्वीकृति का स्पष्ट प्रमाण होना जरूरी है।
न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें आरोपित अधिकारियों को बरी कर दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला बाराबंकी स्थित M/s अमोली सेराप्लास्ट लिमिटेड के रिकॉर्ड जब्त किए जाने से जुड़ा था। अभियोजन के अनुसार, जनवरी 1995 में केंद्रीय उत्पाद शुल्क विभाग के अधिकारियों ने फैक्ट्री में छापा मारकर दस्तावेज अपने कब्जे में ले लिए थे। बाद में शिकायतकर्ता कुलदीप तिवारी ने आरोप लगाया कि रिकॉर्ड लौटाने के बदले ₹80,000 की अवैध मांग की गई।
सीबीआई ने ट्रैप कार्रवाई की और 14 जनवरी 1995 को कथित तौर पर नकदी बरामद की। इसके बाद अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की धाराओं में आरोपपत्र दायर किया गया।
विशेष न्यायाधीश, लखनऊ ने 2014 में कुछ आरोपित अधिकारियों को दोषी ठहराया था। हालांकि, 2019 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए उन्हें बरी कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष रिश्वत मांग और स्वीकार किए जाने के मूल तत्व साबित करने में असफल रहा।
अदालत ने कहा, “साक्ष्य इतने पर्याप्त नहीं थे कि मांग और स्वीकृति जैसी बुनियादी आवश्यकताओं को भी स्थापित किया जा सके।”
पीठ ने दोहराया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषसिद्धि के लिए रिश्वत मांग का प्रमाण अनिवार्य है।
फैसले में कहा गया, “रिश्वत की मांग साबित होना दोषसिद्धि के लिए अनिवार्य शर्त है।”
अदालत ने यह भी नोट किया कि कई स्वतंत्र गवाह और अन्य महत्वपूर्ण गवाह अभियोजन के समर्थन में नहीं आए। कोर्ट ने कहा कि केवल रिश्वत की रकम बरामद होने से अपने आप अपराध साबित नहीं हो जाता।
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी गंभीर टिप्पणी की कि कथित बातचीत की टेप रिकॉर्डिंग अदालत में पेश नहीं की गई।
हाई कोर्ट ने पहले कहा था कि यह महत्वपूर्ण साक्ष्य अभियोजन ने छिपाया। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ऐसे महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को पेश न करने पर अभियोजन के खिलाफ प्रतिकूल अनुमान लगाया जा सकता है।
अदालत ने कहा कि आपराधिक साजिश का आरोप भी रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों से साबित नहीं हुआ।
पीठ के अनुसार, अभियोजन यह दिखाने में असफल रहा कि आरोपित अधिकारियों के बीच किसी अवैध कार्य को लेकर “साझा मंशा” या “मन का मिलन” थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट का फैसला रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर एक “संभव और तार्किक दृष्टिकोण” था और उसमें हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है।
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन रिश्वत की मांग, स्वीकृति और आपराधिक साजिश को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया। इसके साथ ही राज्य सरकार की अपीलें खारिज कर दी गईं।
Case Details
Case Title: State of Uttar Pradesh v. A.K. Gaba & Ors.
Case Number: Criminal Appeal Nos. 3383-3385 of 2025
Judge: Justice Pankaj Mithal and Justice Prasanna B. Varale
Decision Date: May 27, 2026

