गुवाहाटी हाई कोर्ट ने करबी आंगलोंग के एक पुराने हत्या मामले में दोषी ठहराए गए चार लोगों को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि जिन कबूलनामों के आधार पर सजा दी गई थी, वे कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना दर्ज किए गए थे।
डिवीजन बेंच ने पाया कि आरोपियों के बयान दर्ज करते समय कमरे में पुलिस अधिकारी मौजूद था, जिससे यह संदेह पैदा होता है कि बयान पूरी तरह स्वेच्छा से दिए गए थे या नहीं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह अपील 19 जनवरी 2018 के उस फैसले के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें करबी आंगलोंग के सत्र न्यायालय ने आरोपियों को IPC की धारा 302/34 के तहत दोषी ठहराया था।
सुनवाई के दौरान एक आरोपी को किशोर पाया गया और उसका मामला किशोर न्याय बोर्ड को भेज दिया गया।
बचाव पक्ष ने हाई कोर्ट में दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने केवल धारा 164 CrPC के तहत दर्ज कबूलनामों और कथित अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति (extra-judicial confession) के आधार पर सजा सुनाई थी। वकीलों ने कहा कि बयान दर्ज करने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय दिशा-निर्देशों के अनुरूप नहीं थी।
राज्य की ओर से कहा गया कि मजिस्ट्रेट ने आवश्यक प्रक्रिया का पालन किया था और आरोपियों ने स्वयं अपराध स्वीकार किया था।
अदालत की टिप्पणी
हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड का अध्ययन करने के बाद पाया कि कबूलनामा दर्ज करते समय एक पुलिस अधिकारी कमरे में मौजूद था। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि बयान रिकॉर्ड करते समय पुलिस की मौजूदगी नहीं होनी चाहिए।
पीठ ने कहा, “ऐसे कबूलनामे को विधि सम्मत तरीके से दर्ज किया गया नहीं माना जा सकता और इसलिए इसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।”
अदालत ने यह भी नोट किया कि दो आरोपियों को बयान दर्ज होने से पहले ‘reflection time’ के दौरान पुलिस कांस्टेबल की निगरानी में रखा गया था।
अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति के संबंध में अदालत ने कहा कि जिन गवाहों के सामने कथित स्वीकारोक्ति होने की बात कही गई थी, उन्होंने अदालत में इसकी पुष्टि नहीं की।
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि extra-judicial confession अपने आप में कमजोर साक्ष्य माना जाता है और बिना स्वतंत्र पुष्टि के केवल इसी आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।
फैसला
हाई कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई स्वतंत्र और भरोसेमंद साक्ष्य नहीं था जो आरोपियों को अपराध से जोड़ सके।
इसी आधार पर अदालत ने ट्रायल कोर्ट का दोषसिद्धि आदेश रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि यदि आरोपी किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं तो उन्हें तुरंत रिहा किया जाए।
Case Details
Case Title: Jiten Engti & Ors vs The State of Assam & Anr
Case Number: Crl.A./74/2018
Judge: Justice Michael Zothankhuma and Justice Sanjeev Kumar Sharma
Decision Date: 25 May 2026

