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सुप्रीम कोर्ट ने पिता और परिजनों के खिलाफ POCSO मामला रद्द किया, पारिवारिक विवादों में आपराधिक कानून के दुरुपयोग पर जताई चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने मेरठ के पिता और परिवार के खिलाफ POCSO केस रद्द किया - आरोप अस्पष्ट, कोई मेडिकल सबूत नहीं, बयानों में संदिग्ध समानता पाई गई।

CB News Desk
सुप्रीम कोर्ट ने पिता और परिजनों के खिलाफ POCSO मामला रद्द किया, पारिवारिक विवादों में आपराधिक कानून के दुरुपयोग पर जताई चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में एक पिता और उसके परिवार के खिलाफ दर्ज POCSO एक्ट के तहत आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। कोर्ट ने पाया कि लगाए गए आरोप अस्पष्ट थे, उनके समर्थन में कोई सबूत नहीं था, और यह मामला एक अलग हो चुके दंपती के बीच चल रही बदले की लड़ाई का हिस्सा प्रतीत होता है।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुयान की पीठ ने इस मौके पर एक बड़ी और चिंताजनक प्रवृत्ति पर भी कड़ी टिप्पणी की - कि वैवाहिक विवादों में उलझे पक्ष POCSO जैसे गंभीर कानूनों का इस्तेमाल निजी दुश्मनी निकालने के हथियार के रूप में कर रहे हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद करीब डेढ़ दशक पुराना है। ईश्वर चंद शर्मा और उनकी पत्नी की शादी 2008 में हुई थी। 2011 में दोनों अलग हो गए - सिर्फ तीन साल बाद। उनकी बेटी, जिसका जन्म 2009 में हुआ था, पिता और उसके परिवार की देखरेख में रही।

इसके बाद दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के खिलाफ मुकदमों की झड़ी लगा दी - दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, हत्या के प्रयास और न जाने क्या-क्या। जब यह ताजा शिकायत दर्ज हुई, तब तक दोनों परिवारों के बीच दस से ज्यादा आपराधिक और दीवानी मामले अदालतों में लंबित थे।

सितंबर 2024 में पत्नी ने मेरठ के स्पेशल जज (POCSO एक्ट) के सामने एक नई शिकायत दर्ज कराई। आरोप लगाया गया कि लड़की के अपने पिता - अपीलार्थी नंबर 1 - ने तब उसके साथ बलात्कार किया जब वह चौदह साल की थी। इसके अलावा यह भी कहा गया कि एक अन्य परिवार के सदस्य यानी लड़की के चाचा (अपीलार्थी नंबर 4) ने भी उसके साथ बार-बार यौन उत्पीड़न किया। दादी और चाची (अपीलार्थी नंबर 2 और 3) पर आरोप था कि उन्होंने बच्ची को मारपीट कर चुप रहने की धमकी दी।

ट्रायल कोर्ट ने फरवरी 2025 में संज्ञान लिया और अगस्त 2025 में समन जारी किए। परिवार ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में कार्यवाही रद्द करने की अर्जी दी, लेकिन हाई कोर्ट ने मना कर दिया। इसके बाद वे सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।

कोर्ट की अहम टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने शिकायत की बारीकी से जांच की और उसमें कई गंभीर खामियां पाईं।

बलात्कार के आरोपों पर कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता ने केवल एक सरसरी और सामान्य बयान दिया कि पिता ने बेटी के साथ दुष्कर्म किया। पीठ ने कहा,

"किसी भी अन्य समर्थन सामग्री के बिना, यह कहना कि अपीलार्थी नंबर 1 और 4 ने नाबालिग के साथ बलात्कार किया - इतने गंभीर आरोप लगाने के लिए पर्याप्त नहीं है।"

घटना की कोई तारीख नहीं बताई गई। किसी विशेष कृत्य का जिक्र नहीं था। कोई मेडिकल जांच नहीं कराई गई - जबकि शिकायतकर्ता ने खुद माना कि लड़की शिकायत दर्ज होने से कई महीने पहले से उसके पास रह रही थी।

कोर्ट को एक और बात बेहद संदिग्ध लगी। शिकायतकर्ता और लड़की, दोनों के बयान स्पेशल जज के सामने लगभग शब्द-दर-शब्द एक जैसे थे। पीठ ने कहा कि यह "तोते की तरह रटा हुआ" दोहराव एकरूपता नहीं, बल्कि सिखाए-पढ़ाए जाने की निशानी है। कोर्ट ने कहा -

"तीनों दस्तावेजों में न कोई बदलाव, न कोई जोड़, न कोई घटाव - तीनों लगभग एक जैसे हैं। यह संगति नहीं, बल्कि किसी सुनियोजित साजिश का हिस्सा लगता है।"

चाची (अपीलार्थी नंबर 3) पर लगाए गए एक बेहद गंभीर आरोप के बारे में - कि उसने लड़की के साथ एक हथौड़े की मूठ से बर्बरता की - कोर्ट ने कहा कि इस दावे को साबित करने के लिए रिकॉर्ड पर न कोई मेडिकल रिपोर्ट है, न कोई अन्य सबूत। कोर्ट ने सवाल उठाया कि इतनी गंभीर चोट के बाद भी किसी अस्पताल में इलाज नहीं कराया गया - यह स्वाभाविक नहीं लगता।

"वैवाहिक गुलदस्ता" - कोर्ट की व्यापक चेतावनी

न्यायाधीशों ने इस मामले के तथ्यों से आगे जाकर एक बड़ी तस्वीर पेश की। उन्होंने जिसे "मैट्रिमोनियल बुके" यानी "वैवाहिक गुलदस्ता" कहा - उसे परिभाषित करते हुए बताया कि यह वह प्रवृत्ति है जिसमें पत्नी पति और उसके परिवार के खिलाफ दहेज, 498A, घरेलू हिंसा और अब POCSO जैसी धाराओं के तहत एक साथ कई शिकायतें दर्ज कराती है।

पीठ ने कहा,

"इस तरह की मुकदमेबाजी के केंद्र में वह बच्चा होता है जिसे अक्सर उसकी मां अपने पिता के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल करती है - उसकी इच्छा के विरुद्ध।"

हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में यह भी कहा कि यौन उत्पीड़न और बाल यौन शोषण के जो मामले सच्चे हैं, उन्हें पूरी सख्ती से निपटाया जाना चाहिए। असली पीड़ितों को न्याय मिलना ही चाहिए।

वकीलों को भी कोर्ट ने कड़ा संदेश दिया। एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि बार के सदस्यों की यह जिम्मेदारी है कि वे अपने मुवक्किलों को झूठी और तुच्छ शिकायतें दर्ज कराने से रोकें, न कि उन्हें इसके लिए प्रोत्साहित करें।

कोर्ट का फैसला

इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कंप्लेंट केस नंबर 05/2025, संज्ञान आदेश दिनांक 07.02.2025 और समन आदेश दिनांक 18.08.2025 - तीनों को रद्द कर दिया।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस फैसले का असर दोनों पक्षों के बीच चल रहे अन्य वैवाहिक या दीवानी मामलों पर नहीं पड़ेगा। वे मामले अपने गुण-दोष के आधार पर अलग से सुने जाएंगे।

Case Details:

Case Title: Ishwar Chand Sharma & Others v. State of Uttar Pradesh & Another

Case Number: Criminal Appeal No. of 2026 (arising from SLP (Crl.) No. 18035 of 2025)

Judge: Justice B.V. Nagarathna and Justice Ujjal Bhuyan

Decision Date: May 29, 2026

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