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हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत मिली संपत्ति में सभी वारिसों का अलग अधिकार, विधवा केवल अपने हिस्से पर ही निर्णय ले सकती है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत मिली संपत्ति में सभी वारिसों का अलग-अलग हिस्सा होता है और विधवा ‘कर्ता’ बनकर पूरी संपत्ति नहीं बेच सकती। - दारूबाई और अन्य. बनाम कमलाबाई और अन्य।

CB News Desk
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत मिली संपत्ति में सभी वारिसों का अलग अधिकार, विधवा केवल अपने हिस्से पर ही निर्णय ले सकती है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार कानून की व्याख्या करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है कि किसी पुरुष की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति यदि पत्नी और बेटियों को विरासत में मिलती है, तो वे उस संपत्ति की संयुक्त मालिक नहीं बल्कि अलग-अलग हिस्सों की मालिक होती हैं। ऐसे में विधवा स्वयं को परिवार का ‘कर्ता’ बताकर पूरी संपत्ति या अन्य वारिसों के हिस्से को नहीं बेच सकती।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद महाराष्ट्र के नांदेड़ जिले की कृषि भूमि और मकानों से जुड़ा था। संपत्ति दाजीबा नामक व्यक्ति की थी, जिनकी बिना वसीयत किए मृत्यु हो गई थी। उनके निधन के बाद उनकी पत्नी दरुबाई और चार बेटियां कानूनी उत्तराधिकारी बनीं।

साल 1972 में बेटियों ने संपत्ति के बंटवारे और अलग कब्जे के लिए मुकदमा दायर किया। उनका दावा था कि उन्हें संपत्ति में बराबर हिस्सा मिलना चाहिए। दूसरी ओर, दरुबाई ने संपत्ति के एक हिस्से की बिक्री को यह कहकर उचित ठहराया कि यह बिक्री परिवार की आवश्यकता, विशेष रूप से एक बेटी के विवाह के खर्च के लिए की गई थी।

ट्रायल कोर्ट ने बेटियों के पक्ष में फैसला दिया था। बाद में प्रथम अपीलीय अदालत ने बिक्री को वैध माना, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बहाल कर दिया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

न्यायमूर्ति संजय करोल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 8 के तहत मिलने वाली संपत्ति वारिसों को "टेनेंट्स-इन-कॉमन" (अलग-अलग हिस्सेदार) के रूप में प्राप्त होती है, न कि संयुक्त परिवार की संपत्ति के रूप में।

अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक उत्तराधिकारी का हिस्सा निश्चित और स्वतंत्र होता है। इसलिए किसी एक वारिस को पूरे परिवार की ओर से निर्णय लेने या पूरी संपत्ति पर अधिकार जताने का अधिकार नहीं मिलता।

पीठ ने कहा,

“वारिस संपत्ति में निश्चित और पृथक हिस्सों के साथ उत्तराधिकारी बनते हैं तथा संपत्ति उत्तराधिकार के माध्यम से हस्तांतरित होती है, न कि सर्वाइवरशिप (उत्तरजीवी अधिकार) के आधार पर।”

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि दाजीबा की मृत्यु के बाद दरुबाई और उनकी चारों सौतेली बेटियों को संपत्ति में एक-एक पंचमांश (1/5) हिस्सा मिला था।

अदालत ने कहा कि जब सभी के हिस्से स्पष्ट और अलग थे, तब दरुबाई स्वयं को ‘कर्ता’ बताकर अन्य वारिसों के हिस्से वाली संपत्ति नहीं बेच सकती थीं। उन्हें केवल अपने 1/5 हिस्से के संबंध में ही निर्णय लेने का अधिकार था।

पीठ ने कहा कि ऐसी स्थिति में कानूनी आवश्यकता का आधार लेकर पूरी संपत्ति की बिक्री को उचित नहीं ठहराया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने दरुबाई की अपील खारिज कर दी और बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने माना कि पत्नी और चारों बेटियां संपत्ति में बराबर-बराबर 1/5 हिस्से की मालिक हैं तथा विधवा अन्य उत्तराधिकारियों के हिस्से का निपटारा ‘कर्ता’ के रूप में नहीं कर सकती।

अदालत ने यह भी उम्मीद जताई कि पांच दशक से अधिक समय से चल रहा यह पारिवारिक विवाद अब समाप्त होगा और पक्षकार आगे शांतिपूर्ण जीवन जी सकेंगे। मामले में किसी भी पक्ष पर लागत नहीं लगाई गई।

Case Title: Darubai & Anr. v. Kamalabai & Ors.

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