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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी की मेंटेनेंस अपील खारिज की, कहा-योग्य होने पर खुद निर्वाह करना होगा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सक्षम और योग्य पत्नी को केवल बेरोजगारी के आधार पर भरण-पोषण नहीं दिया जा सकता, ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रखा। - डॉ. गरिमा दुबे एवं अन्य बनाम डॉ. सौरभ आनंद दुबे

Rajan Prajapati
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी की मेंटेनेंस अपील खारिज की, कहा-योग्य होने पर खुद निर्वाह करना होगा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया कि यदि पत्नी शिक्षित और पेशेवर रूप से सक्षम है, तो वह केवल इस आधार पर भरण-पोषण (maintenance) की हकदार नहीं हो जाती कि वह फिलहाल काम नहीं कर रही है। कोर्ट ने एक स्त्री रोग विशेषज्ञ (Gynecologist) पत्नी की अपील को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला पति-पत्नी के बीच चल रहे तलाक विवाद से जुड़ा है। पति एक न्यूरोसर्जन हैं, जबकि पत्नी एम.डी. (गायनेकोलॉजी) डिग्री धारक डॉक्टर हैं। दोनों प्रयागराज के निवासी हैं।

पत्नी और तीन बच्चों ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 24 और 26 के तहत भरण-पोषण की मांग की थी। ट्रायल कोर्ट ने बच्चों के लिए मेंटेनेंस की अनुमति दी, जिसके तहत पति हर महीने ₹60,000 दे रहा है।

हालांकि, पत्नी की व्यक्तिगत मेंटेनेंस की मांग को खारिज कर दिया गया। इसी फैसले को चुनौती देते हुए पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की।

पत्नी की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि वह वर्तमान में काम नहीं कर रही हैं और तलाक की कार्यवाही शुरू होने के बाद उन्हें अस्पताल से हटा दिया गया।

उन्होंने कहा कि पत्नी को वही जीवन स्तर बनाए रखने का अधिकार है, जो उसे वैवाहिक जीवन के दौरान प्राप्त था। इसलिए पति को उसका भरण-पोषण करना चाहिए।

पति की ओर से दलील दी गई कि वह पहले से ही बच्चों के लिए ₹60,000 प्रति माह का भुगतान कर रहे हैं।

साथ ही, यह भी कहा गया कि पत्नी एक प्रशिक्षित और विशेषज्ञ डॉक्टर हैं, जो उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में अच्छी आय अर्जित करने में सक्षम हैं। ऐसे में वह खुद अपना खर्च उठा सकती हैं।

दो जजों की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान रिकॉर्ड और पक्षों की दलीलों का गहराई से परीक्षण किया।

कोर्ट ने पाया कि पत्नी एक उच्च शिक्षित स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं और उनके आयकर रिटर्न (ITR) से यह स्पष्ट होता है कि वह पहले ₹31 लाख प्रति वर्ष से अधिक कमा रही थीं।

कोर्ट ने कहा,

“जहां कोई व्यक्ति अपनी विशेषज्ञता के आधार पर पर्याप्त आय अर्जित करने में सक्षम है और फिर भी ऐसा नहीं करता, केवल पति पर बोझ डालने के लिए, वहां अदालत भरण-पोषण देने से इनकार कर सकती है।”

साथ ही, कोर्ट ने यह भी माना कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के Chaturbhuj v. Sitabai फैसले की परिस्थितियां लागू नहीं होतीं, क्योंकि उस मामले में पत्नी वास्तव में बेरोजगार और असमर्थ थी, जबकि यहां स्थिति भिन्न है।

कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि पत्नी की मेंटेनेंस याचिका को खारिज करने में कोई त्रुटि नहीं है।

अंत में अदालत ने कहा,

“हमारे विचार में, impugned order में कोई कमी नहीं है। अपील खारिज की जाती है।”

Case Details

Case Title: Dr Garima Dubey & Ors vs Dr Saurabh Anand Dubey

Case Number: First Appeal No. 594 of 2025

Judges: Hon’ble Justice Atul Sreedharan, Hon’ble Justice Vivek Saran

Decision Date: 21 April 2026

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