बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने अधिवक्ताओं, कानून के छात्रों, इंटर्न्स और अन्य कानूनी पेशेवरों के सोशल मीडिया उपयोग को लेकर एक विस्तृत सर्कुलर जारी किया है। इस सर्कुलर का उद्देश्य अदालतों की गरिमा, पेशेवर नैतिकता और न्याय व्यवस्था में जनता के विश्वास को बनाए रखना है। परिषद ने विशेष रूप से कोर्ट परिसर, न्यायिक कार्यवाही और कानूनी पेशे से जुड़े सोशल मीडिया कंटेंट के बढ़ते व्यावसायिक और सनसनीखेज इस्तेमाल पर चिंता जताई है।
बीसीआई ने यह सर्कुलर क्यों जारी किया?
17 जुलाई 2026 को जारी इस सर्कुलर में बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने कहा कि हाल के समय में कोर्ट परिसर, न्यायिक कार्यवाही, वकीलों के चैंबर और इंटर्नशिप से जुड़े रील्स, शॉर्ट वीडियो, मीम्स, एडिटेड क्लिप्स और प्रचारात्मक पोस्ट तेजी से बढ़े हैं।
परिषद के अनुसार, लाइव-स्ट्रीम की गई कार्यवाहियों के चुनिंदा हिस्सों को काटकर या संदर्भ से हटाकर साझा करना, भ्रामक कानूनी सलाह देना, फर्जी निर्णय (Fake Judgments), मनगढ़ंत कानूनी सारांश और एआई से तैयार सामग्री को वास्तविक कानूनी दस्तावेज़ के रूप में पेश करना न्याय व्यवस्था में लोगों के विश्वास को प्रभावित कर सकता है।
"भारत में विधि व्यवसाय केवल रोजगार, व्यापार या व्यक्तिगत प्रसिद्धि का माध्यम नहीं है, बल्कि यह न्याय प्रशासन से जुड़ा एक प्रतिष्ठित और उत्तरदायी पेशा है।" - बार काउंसिल ऑफ इंडिया
पृष्ठभूमि
बीसीआई ने बताया कि जून 2026 में डिजिटल प्रोफेशनल एथिक्स पर विचार करने के लिए एक उप-समिति गठित की गई थी। समिति की सिफारिशों पर विचार करने के बाद जनरल काउंसिल ने इस व्यापक सर्कुलर को मंजूरी दी।
सर्कुलर में यह भी उल्लेख किया गया है कि अधिवक्ताओं द्वारा सोशल मीडिया के उपयोग और डिजिटल प्रचार से जुड़े मुद्दे वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष भी विचाराधीन हैं। परिषद ने स्पष्ट किया कि यह सर्कुलर मौजूदा एडवोकेट्स एक्ट, 1961 और बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया रूल्स के अनुरूप तैयार किया गया संस्थागत उत्तर है।
सर्कुलर की प्रमुख बातें
बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने अधिवक्ताओं को सलाह दी है कि वे सोशल मीडिया का उपयोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विज्ञापन, मुवक्किल आकर्षित करने या व्यक्तिगत ब्रांडिंग के लिए न करें।
सर्कुलर में जिन गतिविधियों से बचने की सलाह दी गई है, उनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं—
1. न्यायालय परिसर में बिना अनुमति वीडियो या फोटो बनाना।
2. लाइव-स्ट्रीम की गई न्यायिक कार्यवाही के अंशों को काटकर, एडिट कर या सनसनीखेज तरीके से प्रसारित करना।
3. कोर्ट भवन, न्यायिक पोशाक, कोर्ट रूम, कॉज़ लिस्ट या चैंबर को प्रचारात्मक सामग्री में उपयोग करना।
4. मुवक्किलों या मामलों से जुड़ी गोपनीय जानकारी साझा करना।
5. "गारंटीड बेल", "पक्का बरी", "तुरंत राहत" जैसे दावे करना।
6. न्यायाधीशों, अदालतों, अधिवक्ताओं या मुकदमों से संबंधित एआई जनित डीपफेक, सिंथेटिक वीडियो या भ्रामक सामग्री तैयार या प्रसारित करना।
7 फर्जी न्यायिक आदेश, मनगढ़ंत निर्णय या झूठे कानूनी दस्तावेज़ साझा करना।
कानून के छात्रों और इंटर्न्स पर भी लागू होंगे नियम
सर्कुलर केवल अधिवक्ताओं तक सीमित नहीं है। इसमें कानून के छात्रों और इंटर्न्स के लिए भी विशेष दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।
बार काउंसिल ने कहा है कि इंटर्नशिप का उद्देश्य पेशेवर नैतिकता, शोध और न्यायिक कार्यप्रणाली सीखना है, न कि "Day in Court", "Internship Reveal" या कोर्ट लाइफ जैसे सोशल मीडिया कंटेंट बनाना।
इसके लिए कानून की पढ़ाई में प्रवेश के समय तथा इंटर्नशिप शुरू करने से पहले अलग से लिखित घोषणा (Undertaking) लेने का भी प्रस्ताव रखा गया है।
जिम्मेदार कानूनी जागरूकता पर कोई रोक नहीं
बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने स्पष्ट किया है कि यह सर्कुलर जिम्मेदार कानूनी शिक्षा या जन-जागरूकता पर रोक लगाने के लिए नहीं है।
सही तथ्यों पर आधारित न्यायालय के निर्णयों की चर्चा, कानूनी शिक्षा, संविधान संबंधी जानकारी, अकादमिक लेख, सेमिनार, निष्पक्ष कानूनी रिपोर्टिंग और जनहित में तैयार कानूनी सामग्री को प्रोत्साहित किया गया है, बशर्ते वह प्रचारात्मक, भ्रामक या परिणाम की गारंटी देने वाली न हो।
परिषद ने कहा कि कानूनी शिक्षा का स्वागत है, लेकिन जब सामग्री प्रचारात्मक, सनसनीखेज, भ्रामक, मानहानिकारक या पेशे की गरिमा के विपरीत हो जाती है, तब वह स्वीकार्य नहीं रहती।
कोर्ट के बाहर भी लागू होंगे पेशेवर नैतिकता के नियम
सर्कुलर में कहा गया है कि अधिवक्ता केवल अदालत के भीतर ही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी अपने पेशेवर आचरण के लिए उत्तरदायी हैं।
बीसीआई ने स्पष्ट किया कि यह कोई नया आचार संहिता नहीं है, बल्कि मौजूदा एडवोकेट्स एक्ट, 1961 और बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया रूल्स के सिद्धांतों को डिजिटल युग में लागू करने का प्रयास है।
कार्यान्वयन की व्यवस्था
सर्कुलर के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए राज्य बार काउंसिलों, बार एसोसिएशनों, विधि शिक्षण संस्थानों और अन्य संबंधित संस्थाओं को डिजिटल एथिक्स अपनाने, निगरानी तंत्र विकसित करने तथा आवश्यक घोषणापत्र और शपथपत्र लागू करने का सुझाव दिया गया है।
निष्कर्ष
सोशल मीडिया, कानूनी इन्फ्लुएंसर्स और एआई आधारित कंटेंट के बढ़ते प्रभाव के बीच बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने पेशेवर नैतिकता को डिजिटल युग के अनुरूप स्पष्ट करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। यह सर्कुलर जिम्मेदार कानूनी शिक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को स्वीकार करता है, लेकिन साथ ही अदालतों की गरिमा, पेशेवर गोपनीयता और अधिवक्ताओं के नैतिक दायित्वों को बनाए रखने पर विशेष जोर देता है।
साथ ही, परिषद ने यह भी स्पष्ट किया है कि प्रत्येक सोशल मीडिया पोस्ट स्वतः अनुशासनात्मक कार्रवाई का आधार नहीं होगी; प्रत्येक मामले का मूल्यांकन संबंधित तथ्यों और लागू कानून के अनुसार किया जाएगा।

