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लगभग ₹234 करोड़ बैंक धोखाधड़ी मामले में लुई ड्रेफस इंडिया को राहत, कलकत्ता हाई कोर्ट ने PMLA केस किया रद्द

कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा कि ED के पास लुई ड्रेफस इंडिया के खिलाफ पर्याप्त स्वतंत्र सबूत नहीं हैं, इसलिए कंपनी के खिलाफ PMLA कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। - लुई ड्रेफस कंपनी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड बनाम प्रवर्तन निदेशालय, भारत सरकार

Shivam Y.
लगभग ₹234 करोड़ बैंक धोखाधड़ी मामले में लुई ड्रेफस इंडिया को राहत, कलकत्ता हाई कोर्ट ने PMLA केस किया रद्द

कलकत्ता हाई कोर्ट ने लुई ड्रेफस कंपनी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा चलाए जा रहे मनी लॉन्ड्रिंग मामले को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि उपलब्ध सामग्री कंपनी के खिलाफ प्रथमदृष्टया मामला बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है और मुकदमे को जारी रखना अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

जस्टिस सुव्रा घोष ने यह आदेश ₹234.57 करोड़ के कथित बैंक धोखाधड़ी मामले से जुड़े PMLA केस में पारित किया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 31 मार्च 2014 को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) द्वारा दर्ज FIR से शुरू हुआ था। शिकायत सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की ओर से की गई थी, जिसमें प्रकाश वाणिज्य प्राइवेट लिमिटेड (PVPL) और उसके निदेशक मनोज कुमार जैन समेत अन्य लोगों पर बैंक को भारी नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया गया था।

CBI ने बाद में धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश समेत विभिन्न धाराओं में चार्जशीट दायर की। इसके आधार पर ED ने PMLA के तहत ECIR दर्ज कर लुई ड्रेफस इंडिया सहित अन्य लोगों के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग की कार्यवाही शुरू की।

ED का आरोप था कि कंपनी ने “सर्कुलर ट्रेडिंग” के जरिए 25 करोड़ रुपये के लेटर ऑफ क्रेडिट (LC) से जुड़े लेन-देन में भूमिका निभाई और कथित अपराध से प्राप्त रकम को वैध दिखाने की कोशिश की।

लुई ड्रेफस इंडिया की ओर से अदालत में कहा गया कि कंपनी को CBI द्वारा दर्ज मूल आपराधिक मामले में कभी आरोपी नहीं बनाया गया। कंपनी ने यह भी कहा कि संबंधित व्यापारिक लेन-देन वेयरहाउस रसीदों के जरिए हुए थे, जो व्यापारिक कानून के तहत वैध प्रक्रिया है।

कंपनी का कहना था कि CBI जांच में यह भी सामने आया कि उसके जरिए किसी फंड डायवर्जन या अवैध लाभ का कोई प्रमाण नहीं मिला।

हाई कोर्ट ने माना कि किसी व्यक्ति को PMLA के तहत आरोपी बनाने के लिए यह जरूरी नहीं कि वह मूल अनुसूचित अपराध में भी आरोपी हो। लेकिन उसके खिलाफ “अपराध से अर्जित संपत्ति” से जुड़ी गतिविधियों में शामिल होने के पर्याप्त सबूत होने चाहिए।

अदालत ने पाया कि ED ने मुख्य रूप से सह-आरोपी मनोज कुमार जैन के बयान पर भरोसा किया था, जो PMLA की धारा 50 के तहत दर्ज किया गया था। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अभियोजन केवल सह-आरोपी के बयान के आधार पर शुरू नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी नोट किया कि क्वालिटी विनट्रेड प्राइवेट लिमिटेड (QVPL), जिसे कथित लेन-देन में शामिल बताया गया, उसे न तो CBI केस में आरोपी बनाया गया और न ही PMLA मामले में।

कोर्ट ने कहा, “याचिकाकर्ता के खिलाफ उपलब्ध सामग्री उसे मुकदमे का सामना कराने के लिए पर्याप्त नहीं है।”

हाई कोर्ट ने CRR 1145 of 2024 याचिका स्वीकार करते हुए मनी लॉन्ड्रिंग केस नंबर 7/2018 को लुई ड्रेफस कंपनी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ रद्द कर दिया। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि अन्य आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही जारी रहेगी।

अदालत ने कंपनी को उसके बेल बॉन्ड से भी मुक्त करने का निर्देश दिया।

Case Details

Case Title: Louis Dreyfus Company India Private Limited v. Enforcement Directorate, Government of India

Case Number: CRR 1145 of 2024

Judge: Justice Suvra Ghosh

Decision Date: 22 May 2026

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