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पीड़िता की विश्वसनीय गवाही दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त: दिल्ली हाई कोर्ट ने 2001 हमले के मामले में सजा बरकरार रखी, जेल अवधि घटाई

Shivam Y.
पीड़िता की विश्वसनीय गवाही दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त: दिल्ली हाई कोर्ट ने 2001 हमले के मामले में सजा बरकरार रखी, जेल अवधि घटाई

दिल्ली हाई कोर्ट ने वर्ष 2001 के एक हमले और महिला से दुर्व्यवहार के मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति की सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि पीड़िता की गवाही भरोसेमंद है और मेडिकल साक्ष्य उससे पूरी तरह मेल खाते हैं। हालांकि, करीब 25 साल तक मुकदमा झेलने और आरोपी की वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने उसकी सजा में राहत दी। 

मामला क्या था

मामला 10 सितंबर 2001 का है। अभियोजन के अनुसार, पीड़िता सुबह खेतों से पशुओं के लिए चारा लेने गई थी। लौटते समय आरोपी मनोज कुमार ने उसे रास्ते में रोक लिया और कथित तौर पर गलत इरादे से उसे “ज्वार” के खेत में खींच ले गया। विरोध करने पर उसने महिला के साथ मारपीट की और धमकी दी। बाद में पीड़िता ने घर पहुंचकर घटना की जानकारी परिवार को दी, जिसके बाद पुलिस में शिकायत दर्ज हुई। 

ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को आईपीसी की धारा 324, 354 और 506 के तहत दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। इसी फैसले को आरोपी ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। 

अपील में आरोपी की ओर से कहा गया कि उसे संपत्ति विवाद के कारण झूठा फंसाया गया है। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि पीड़िता के बयान में कई “सुधार” और विरोधाभास हैं, इसलिए उसकी गवाही पर भरोसा नहीं किया जा सकता। 

बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि घटना के कुछ विवरण शुरुआती शिकायत में नहीं थे और बाद में जोड़े गए।

स्टिस विमल कुमार यादव ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि पीड़िता के बयान में जो छोटे-मोटे अंतर बताए गए हैं, वे मामले की जड़ को प्रभावित नहीं करते।

कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि पीड़िता के शरीर पर चोट, खरोंच, सूजन और काटने के निशान पाए गए थे, जो उसके बयान की पुष्टि करते हैं। 

अदालत ने कहा,

“पीड़िता की कहानी और मेडिकल रिपोर्ट में दर्ज चोटें एक-दूसरे से मेल खाती हैं, इसलिए अभियोजन के मामले पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है।”

हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यौन अपराधों और महिला से छेड़छाड़ जैसे मामलों में यदि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय और साफ हो, तो केवल उसी के आधार पर दोषसिद्धि की जा सकती है। 

कोर्ट ने यह भी माना कि सामाजिक शर्म और दबाव के कारण महिलाएं कई बार शुरुआती शिकायत में हर बात विस्तार से नहीं बता पातीं।

अदालत ने कहा कि पीड़िता की गवाही “स्टर्लिंग क्वालिटी” की है और उस पर भरोसा किया जा सकता है।

हालांकि हाई कोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखी, लेकिन सजा के मुद्दे पर आरोपी को कुछ राहत दी। अदालत ने ध्यान दिया कि घटना के समय आरोपी की उम्र 21 वर्ष थी और अब वह लगभग 50 वर्ष का है तथा पारिवारिक जिम्मेदारियां निभा रहा है। 

कोर्ट ने आईपीसी की धारा 324, 354 और 506 के तहत दी गई सजा को घटाकर छह-छह महीने कर दिया। जुर्माने की राशि में कोई बदलाव नहीं किया गया।

अदालत ने आरोपी को शेष सजा काटने के लिए तत्काल सरेंडर करने का निर्देश भी दिया।

Case Details:

Case Title: Manoj Kumar vs. State (NCT of Delhi)

Case Number: CRL.A. 703/2008

Judge: Justice Vimal Kumar Yadav

Decision Date: May 20, 2026 

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