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सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को अनुच्छेद 142 की शक्तियाँ देने की याचिका खारिज की, कहा "पूरी तरह से भ्रांत धारणा"

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को अनुच्छेद 142 की शक्तियाँ देने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया, यह कहते हुए कि केवल सर्वोच्च न्यायालय को ही यह अधिकार प्राप्त है। पीठ ने इस याचिका को "पूरी तरह से भ्रांत धारणा" बताया और स्पष्ट किया कि संविधान संशोधन केवल संसद ही कर सकती है।

Shivam Y.
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को अनुच्छेद 142 की शक्तियाँ देने की याचिका खारिज की, कहा "पूरी तरह से भ्रांत धारणा"

22 अप्रैल को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें यह मांग की गई थी कि हाईकोर्ट को अनुच्छेद 142 के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट जैसी शक्तियाँ दी जाएं। कोर्ट ने इस याचिका को “पूरी तरह से भ्रांत धारणा” बताया।

“संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत दिया गया अधिकार केवल इस न्यायालय को प्राप्त है, हाईकोर्ट को नहीं।”— सुप्रीम कोर्ट

जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस उज्जल भुयान की पीठ ने यह याचिका खारिज की, जिसे पंकज के. फडणीस ने व्यक्तिगत रूप से प्रस्तुत किया था। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि हाईकोर्ट को भी पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए वही अधिकार दिए जाएं जो सुप्रीम कोर्ट को अनुच्छेद 142 के तहत प्राप्त हैं।

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हालांकि, जस्टिस ओका ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार की मांग संविधान संशोधन के बिना स्वीकार नहीं की जा सकती, और यह कार्य केवल संसद ही कर सकती है। उन्होंने कहा:

“आपकी प्रार्थना है कि हम हाईकोर्ट को अनुच्छेद 142 के तहत इस न्यायालय की शक्तियाँ दें। क्या यह संविधान संशोधित किए बिना किया जा सकता है? हम संविधान के किसी भाग को रद्द कर सकते हैं लेकिन संशोधन नहीं कर सकते।”— जस्टिस अभय एस. ओका

जब याचिकाकर्ता ने कहा कि एक संविधान पीठ इस पर निर्णय ले सकती है, तब जस्टिस ओका ने उत्तर दिया कि संविधान पीठ भी संविधान में संशोधन नहीं कर सकती। जब याचिकाकर्ता ने पूछा, “मैं कहाँ जाऊँ?”, तो जस्टिस ओका ने जवाब दिया:

“आप संसद जाइए। हम संविधान संशोधित नहीं कर सकते।”— जस्टिस अभय एस. ओका

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याचिकाकर्ता ने यह तर्क भी दिया कि अनुच्छेद 226 को अनुच्छेद 142 के समान माना जा सकता है, लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया। पीठ ने एमिकस क्यूरी नियुक्त करने के अनुरोध को भी ठुकरा दिया।

कोर्ट ने याचिकाकर्ता की उस याचिका को भी खारिज कर दिया जिसमें यह अनुरोध किया गया था कि हाईकोर्ट को अनुच्छेद 142 के तहत दायर की गई रिट याचिका पर सुनवाई करने का निर्देश दिया जाए।

“इसलिए हम हाईकोर्ट को यह अनुमति नहीं दे सकते कि वह संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत दायर याचिका की सुनवाई करते समय इस न्यायालय की अनुच्छेद 142 की शक्तियों का प्रयोग करे। याचिकाकर्ता द्वारा की गई प्रार्थना में कोई मेरिट नहीं है। इसलिए एमिकस क्यूरी की नियुक्ति या मामले को संविधान पीठ को भेजने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।”— सुप्रीम कोर्ट

केस नं. – अभिनव भारत कांग्रेस बनाम भारत संघ और अन्य

केस का शीर्षक – डब्ल्यू.पी.(सी) नं. 395/2025

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