सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि किसी बच्चे द्वारा POCSO (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम) के तहत अपराध की जानकारी सीधे किसी व्यक्ति को दी जाती है, तो वह पहले अपनी निजी जांच नहीं कर सकता। ऐसे मामले में कानून के अनुसार तुरंत पुलिस को सूचना देना अनिवार्य है।
इसी सिद्धांत को लागू करते हुए अदालत ने स्कूल की तत्कालीन हेडमिस्ट्रेस लिंडा सेमा के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही बहाल कर दी। हालांकि, अन्य स्कूल अधिकारियों को मिली राहत बरकरार रखते हुए उनका डिस्चार्ज आदेश कायम रखा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला अरुणाचल प्रदेश के एक आवासीय विद्यालय से जुड़ा है। पीड़िता की मां ने एफआईआर दर्ज कर आरोप लगाया था कि उनकी आठ वर्षीय बेटी ने बताया कि नवंबर 2019 में एक वरिष्ठ छात्र ने उसके साथ यौन उत्पीड़न किया था।
शिकायत के अनुसार, बच्ची ने सबसे पहले यह बात अपनी बड़ी बहन को बताई। इसके बाद बड़ी बहन ने स्कूल की हेड गर्ल को जानकारी दी, जिसने यह सूचना लिंडा सेमा तक पहुंचाई।
जांच में आरोप लगाया गया कि पुलिस को सूचना देने के बजाय स्कूल प्रबंधन ने पहले बच्ची की जांच की, शिक्षकों की बैठक बुलाई और तय किया कि मामले को बाहर नहीं बताया जाएगा। यह भी आरोप था कि छात्राओं को घटना के बारे में किसी से बात न करने के निर्देश दिए गए। बाद में पुलिस ने किशोर आरोपी के साथ-साथ कई स्कूल अधिकारियों के खिलाफ भी आरोपपत्र दाखिल किया।
हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने सभी स्कूल अधिकारियों को आरोपमुक्त कर दिया था और गुवाहाटी हाईकोर्ट ने भी उस आदेश को बरकरार रखा था।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने POCSO अधिनियम की धारा 19 की व्याख्या करते हुए कहा कि "ज्ञान" (Knowledge) का अर्थ केवल अपराध को अपनी आंखों से देखना नहीं है।
अदालत ने कहा कि यदि पीड़ित बच्चा स्वयं किसी व्यक्ति को अपराध की जानकारी देता है, तो वही जानकारी रिपोर्ट करने की कानूनी जिम्मेदारी पैदा करने के लिए पर्याप्त है।
पीठ ने कहा,
"यदि किसी व्यक्ति को स्वयं पीड़ित से अपराध की जानकारी मिलती है, तो यह माना जाएगा कि उसे उस अपराध के बारे में जानकारी है।"
अदालत ने आगे स्पष्ट किया,
"घटना की सच्चाई की जांच रिपोर्ट दर्ज होने के बाद की जानी चाहिए, उससे पहले नहीं।"
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि स्कूल या अन्य संस्थानों को पहले अपनी जांच करने की अनुमति दे दी जाए, तो इससे POCSO कानून का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा, क्योंकि इस कानून का मकसद बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तत्काल रिपोर्टिंग करना है।
लिंडा सेमा के खिलाफ क्यों बहाल हुई कार्यवाही
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि जांच के दौरान एकत्र सामग्री से प्रथम दृष्टया यह संकेत मिलता है कि पीड़िता ने लिंडा सेमा को सीधे घटना की जानकारी दी थी।
इसके बावजूद उन्होंने पुलिस को सूचना देने के बजाय पहले स्वयं आरोपों की पुष्टि करने का प्रयास किया। अदालत ने कहा कि इस आधार पर उनके खिलाफ POCSO अधिनियम की धारा 21 के तहत कथित रूप से सूचना न देने के अपराध का मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद है।
पीठ ने यह भी कहा कि यह दलील कि उन्होंने अपनी जांच में यौन उत्पीड़न के स्पष्ट संकेत नहीं पाए, इसलिए रिपोर्ट नहीं की, इस प्रारंभिक चरण में स्वीकार नहीं की जा सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोप तय करने के चरण पर केवल यह देखा जाता है कि मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त प्रथम दृष्टया सामग्री है या नहीं।
अन्य स्कूल अधिकारियों को राहत
दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट ने अन्य शिक्षकों और स्कूल अधिकारियों के संबंध में अलग निष्कर्ष निकाला।
अदालत ने कहा कि उपलब्ध जांच सामग्री से यह नहीं दिखता कि पीड़िता ने उन्हें सीधे घटना की जानकारी दी थी। केवल इतना कि उन्हें बाद में घटना की सूचना मिली थी, उन्हें स्वतः POCSO अधिनियम के तहत अभियोजन के लिए पर्याप्त आधार नहीं बनाता।
पीठ ने यह भी माना कि उपलब्ध रिकॉर्ड में उनके खिलाफ आपराधिक साजिश या साक्ष्य मिटाने के आरोपों को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं है। इसलिए उनके डिस्चार्ज आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं बनता।
फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए लिंडा सेमा को दी गई राहत रद्द कर दी और उनके खिलाफ POCSO अधिनियम के तहत कथित रूप से सूचना न देने के मामले में आपराधिक कार्यवाही फिर से शुरू करने का आदेश दिया। वहीं, अन्य स्कूल अधिकारियों के संबंध में ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा पारित डिस्चार्ज आदेश को बरकरार रखा।
Case Details:
Case Title: AAA v. Linda Sema & Ors.
Case Number: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 4772 of 2024
Judge: Justice Manoj Misra & Justice K.V. Viswanathan
Decision Date: 9 July 2026


