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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बिजनौर परिवार के खिलाफ जमीन-ऋण विवाद में आपराधिक मामला किया खारिज

शिवम एवं 3 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य - इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भूमि-ऋण विवाद में बिजनौर परिवार के खिलाफ आपराधिक मामला रद्द कर दिया, तथा मामले को आपराधिक नहीं बल्कि सिविल माना।

Shivam Y.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बिजनौर परिवार के खिलाफ जमीन-ऋण विवाद में आपराधिक मामला किया खारिज

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बिजनौर परिवार के चार सदस्यों के खिलाफ भूमि-ऋण विवाद में आपराधिक विश्वासघात और साजिश के आरोपों पर चल रही कार्यवाही को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान की पीठ ने 3 सितंबर 2025 को यह आदेश सुनाया, जिससे आठ साल से चली आ रही कानूनी लड़ाई में आवेदकों को राहत मिली।

पृष्ठभूमि

यह मामला मार्च 2017 में शुरू हुआ था, जब मंजू त्यागी ने बढ़ापुर थाने में शिकायत दर्ज कराई। उनका आरोप था कि शिवम अग्रवाल और उनके परिवार ने उनसे और उनके रिश्तेदारों से कृषि भूमि खरीदी और उस पर बकाया ₹9.65 लाख का ऋण चुकाने का वादा किया। शिकायत के अनुसार, खरीदारों ने यह राशि नहीं चुकाई, जिसके चलते विक्रेताओं को बैंक से नोटिस मिलने लगे।

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पुलिस ने जांच के बाद जून 2017 में आरोपपत्र दाखिल किया और धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात) तथा 120-B (आपराधिक साजिश) आईपीसी के तहत मामला दर्ज किया गया। उसी वर्ष निचली अदालत ने संज्ञान लिया।

दूसरी ओर, अग्रवाल परिवार का कहना था कि उन्हें सौदे के समय ऋण के बारे में गलत जानकारी दी गई थी, लेकिन बाद में उन्होंने 2018 में पंजाब नेशनल बैंक के साथ वन-टाइम सेटलमेंट (ओटीएस) योजना के तहत ऋण चुका दिया। परिवार ने बैंक की रसीदें, समझौता दस्तावेज और “नो ड्यूज़” प्रमाणपत्र अदालत में प्रस्तुत किया।

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अदालत की टिप्पणियाँ

न्यायमूर्ति चौहान ने यह जांच की कि क्या लगाए गए आरोप वास्तव में आपराधिक अपराध बनते हैं। अदालत ने माना कि जमीन 2015 में पंजीकृत बिक्री विलेखों के जरिए बेची गई थी और खरीदारों ने ऋण चुकाने की जिम्मेदारी ली थी। हालांकि, बिक्री विलेख में ऋण चुकाने के लिए कोई निश्चित समय सीमा तय नहीं की गई थी।

जज ने टिप्पणी की,

'संपत्ति की बिक्री से विक्रेता और खरीदार के बीच कोई ट्रस्ट संबंध नहीं बनता। यदि बिक्री अनुबंध की किसी शर्त का उल्लंघन होता है, तो यह दीवानी (सिविल) दायित्व होगा, न कि आपराधिक।'

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए, पीठ ने कहा कि केवल अनुबंध संबंधी शर्त पूरी न करने से आपराधिक विश्वासघात का मामला नहीं बन सकता। चूंकि आवेदकों ने पहले ही बैंक का बकाया चुका दिया था और बैंक से आधिकारिक प्रमाणपत्र भी प्राप्त कर लिया था, इसलिए उनके खिलाफ बेईमानी का इरादा साबित नहीं हुआ।

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फैसला

अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि यह विवाद आपराधिक नहीं बल्कि अनुबंध आधारित है। इसलिए हाईकोर्ट ने आरोपपत्र और आपराधिक मामला (क्रिमिनल केस नंबर 1702/2017) पूरी तरह खारिज कर दिया।

आदेश में साफ कहा गया:

"तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, वर्तमान आवेदन स्वीकार किया जाता है और आपराधिक कार्यवाही… को यहां से खारिज किया जाता है।"

इस फैसले के साथ ही अदालत ने मामला समाप्त कर दिया, जिससे अग्रवाल परिवार की वर्षों पुरानी कानूनी लड़ाई खत्म हो गई।

केस का शीर्षक: शिवम एवं तीन अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य

केस संख्या: आवेदन धारा 482 संख्या 15400/2018

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