कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए लक्ज़मबर्ग में रहने वाली एक महिला (पति की बहन) के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि केवल यह आरोप कि वह विदेश से फोन कर परिवार के अन्य सदस्यों को उकसाती थी, अपने आप में भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के तहत आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता, जो शिकायतकर्ता की ननद (पति की बहन) हैं, ने कर्नाटक हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सब्रमण्यपुरा पुलिस स्टेशन, बेंगलुरु में दर्ज क्राइम नंबर 377/2024 को रद्द करने की मांग की थी। उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धाराओं 498A, 312, 504 और 506 तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धाराओं 3 और 4 के तहत मामला दर्ज किया गया था।
शिकायतकर्ता का आरोप था कि जुलाई 2022 में विवाह के बाद उसके पति और ससुराल पक्ष ने दहेज की मांग को लेकर उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया। शिकायत में यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ता, जो वर्ष 2017 से लक्ज़मबर्ग में रह रही हैं, फोन के माध्यम से अपने परिवार के सदस्यों से बात कर शिकायतकर्ता के साथ दुर्व्यवहार करने और दहेज की मांग करने के लिए उकसाती थीं।
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि वह विवाह से कई वर्ष पहले ही विदेश में बस चुकी थीं और वैवाहिक जीवन में उनका कोई प्रत्यक्ष हस्तक्षेप नहीं था।
अदालत की टिप्पणियां
न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना ने शिकायत का अवलोकन करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ केवल इतना आरोप है कि उन्होंने लक्ज़मबर्ग से फोन पर अपने परिवार के सदस्यों से बातचीत की। शिकायत में ऐसा कोई विशिष्ट आरोप नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि उन्होंने कथित अपराधों में प्रत्यक्ष भूमिका निभाई।
अदालत ने कहा,
"सिर्फ टेलीफोन पर बातचीत के माध्यम से कथित उकसावा देना, धारा 498A के आवश्यक तत्वों को पूरा नहीं करता।"
हाईकोर्ट ने इस दौरान कहकशां कौसर बनाम बिहार राज्य, मरम निर्मला बनाम तेलंगाना राज्य और दारा लक्ष्मी नारायण बनाम तेलंगाना राज्य जैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि वैवाहिक विवादों में पति के रिश्तेदारों के खिलाफ केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर आपराधिक कार्रवाई जारी नहीं रखी जा सकती।
अदालत ने कहा कि यदि किसी रिश्तेदार के खिलाफ अपराध में उसकी स्पष्ट और विशिष्ट भूमिका नहीं बताई गई है, तो उसे मुकदमे का सामना करने के लिए मजबूर करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
अन्य धाराओं पर भी अदालत की राय
हाईकोर्ट ने IPC की धाराओं 312, 504 और 506 के तहत लगाए गए आरोपों का भी परीक्षण किया।
सुप्रीम कोर्ट के मोहम्मद वाजिद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य फैसले का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि शिकायत में ऐसे कोई तथ्य नहीं हैं जिनसे इन धाराओं के आवश्यक तत्व याचिकाकर्ता के खिलाफ प्रथम दृष्टया स्थापित होते हों। अदालत ने पाया कि न तो आपराधिक धमकी, न जानबूझकर अपमान और न ही धारा 312 से संबंधित आरोपों के समर्थन में कोई विशिष्ट सामग्री मौजूद है।
शिकायतकर्ता की ओर से यह दलील दी गई कि विदेश से किए गए लगातार फोन कॉल भी आपराधिक दायित्व पैदा करते हैं। इस पर अदालत ने कहा,
"यदि इस तर्क को स्वीकार कर लिया जाए, तो इसका अर्थ होगा कि किसी भी ननद द्वारा अपनी भाभी से किया गया हर टेलीफोन कॉल आपराधिक दायित्व का आधार बन सकता है, जो कानून की सीमा का अनुचित विस्तार होगा।"
अदालत ने स्पष्ट किया कि शिकायत में लगाए गए आरोप, अपने उच्चतम रूप में स्वीकार किए जाने पर भी, याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई संज्ञेय अपराध स्थापित नहीं करते।
फैसला
कर्नाटक हाईकोर्ट ने आपराधिक याचिका स्वीकार करते हुए क्राइम नंबर 377/2024 को याचिकाकर्ता के संबंध में रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि जब शिकायत में याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी भी आरोप के समर्थन में स्पष्ट और विशिष्ट तथ्य मौजूद नहीं हैं, तब उनके खिलाफ आपराधिक जांच और मुकदमा जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
Case Details
Case Title: Mrs. V. N. v. State of Karnataka & Anr.
Case Number: Criminal Petition No. 10716 of 2024
Judge: Justice M. Nagaprasanna
Decision Date: 25 June 2026

