बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि केवल विवाहेतर संबंध (Extra-Marital Affair) का संदेह या सामान्य आरोप किसी रिश्तेदार के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक किसी व्यक्ति की क्रूरता, दहेज मांग या उत्पीड़न में सक्रिय भूमिका के ठोस और विशिष्ट आरोप न हों, तब तक केवल शक के आधार पर उसे मुकदमे में घसीटा नहीं जा सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने पति के चचेरे भाई की पत्नी के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला वर्ष 2019 में रेवदंडा पुलिस स्टेशन, अलीबाग में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है। शिकायतकर्ता महिला ने अपने पति, उसके परिवार के सदस्यों और पति के चचेरे भाई की पत्नी के खिलाफ धारा 498A, 107, 323, 504, 506 एवं 34 IPC के तहत मामला दर्ज कराया था।
शिकायत में आरोप लगाया गया कि विवाह के बाद पति ने उसके साथ मारपीट की, दहेज की मांग की और उसे मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया। इसके अलावा महिला ने आरोप लगाया कि उसके पति का अपनी चचेरे भाई की पत्नी के साथ विवाहेतर संबंध था। उसके अनुसार पति अक्सर उसी से फोन पर बात करता था, सोशल मीडिया पर उसकी तस्वीरें साझा करता था और उसके बेटे का नाम अपने हाथ पर गुदवाया हुआ था। शिकायतकर्ता का यह भी आरोप था कि उक्त महिला के कहने पर उसका पति उसे प्रताड़ित करता था।
इन आरोपों को चुनौती देते हुए संबंधित महिला ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की।
अदालत की टिप्पणी
न्यायमूर्ति रंजीतसिंह राजा भोंसले ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि एफआईआर में पति के खिलाफ दहेज मांग, मारपीट और उत्पीड़न के विस्तृत आरोप हैं, लेकिन याचिकाकर्ता के खिलाफ केवल संदेह आधारित आरोप लगाए गए हैं।
अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता के साथ किसी प्रकार की क्रूरता की, दहेज की मांग में भाग लिया या पति को ऐसा करने के लिए उकसाया। यह भी रिकॉर्ड पर था कि याचिकाकर्ता शिकायतकर्ता और उसके पति के साथ एक ही घर में नहीं रहती थी।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि वैवाहिक विवादों में अक्सर पति के पूरे परिवार को सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर आरोपी बना दिया जाता है। ऐसे मामलों में अदालतों को यह देखना चाहिए कि प्रत्येक आरोपी के खिलाफ कोई स्पष्ट और विशिष्ट भूमिका बताई गई है या नहीं।
अदालत ने कहा,
"विश्वसनीय सामग्री के बिना लगाए गए सामान्य और व्यापक आरोप केवल संदेह के आधार पर धारा 498A लागू करने का आधार नहीं बन सकते।"
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 498A तभी लागू होगी जब आरोपी द्वारा ऐसा जानबूझकर किया गया व्यवहार हो जो महिला को आत्महत्या करने के लिए मजबूर करने या गंभीर शारीरिक अथवा मानसिक क्षति पहुंचाने की श्रेणी में आए, या फिर दहेज की अवैध मांग पूरी कराने के उद्देश्य से उत्पीड़न किया गया हो। सामान्य वैवाहिक मतभेद या बिना साक्ष्य के लगाए गए आरोप इस धारा के दायरे में नहीं आते।
विवाहेतर संबंध के आरोप पर अदालत ने कहा कि यदि ऐसा संबंध मान भी लिया जाए, तब भी केवल उसी आधार पर धारा 498A का अपराध नहीं बनता। इसके लिए यह दिखाना आवश्यक है कि आरोपी के आचरण ने कानून में परिभाषित "क्रूरता" की सीमा को पार किया हो।
अदालत ने आगे कहा,
"सिर्फ निराधार संदेह कानूनी या ठोस साक्ष्य का स्थान नहीं ले सकता।"
अदालत का फैसला
रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री का मूल्यांकन करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोप सामान्य, अस्पष्ट और विश्वसनीय साक्ष्यों से रहित हैं। इसलिए उसके खिलाफ धारा 498A सहित अन्य धाराओं के तहत आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
इसी आधार पर अदालत ने याचिकाकर्ता के विरुद्ध दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह राहत केवल याचिकाकर्ता तक सीमित है।
शिकायतकर्ता के पति और अन्य सह-आरोपियों के खिलाफ मुकदमा कानून के अनुसार जारी रहेगा, क्योंकि वे इस याचिका में पक्षकार नहीं थे।
Case Details
Case Title: Mrs. N G v. State of Maharashtra & Anr.
Case Number: Criminal Writ Petition No. 1158 of 2021
Judge: Justice Ranjitsinha Raja Bhonsale
Decision Date: 10 June 2026

