इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी को दिए गए ₹20,000 प्रति माह के भरण-पोषण (मेंटेनेंस) के आदेश को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि केवल पत्नी के शिक्षित होने या उसके नौकरी करने की क्षमता होने से यह नहीं माना जा सकता कि वह अपना खर्च स्वयं उठा सकती है। जब तक उसकी पर्याप्त आय का ठोस प्रमाण न हो, उसे मेंटेनेंस से वंचित नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मैनपुरी फैमिली कोर्ट के 14 अगस्त 2024 के आदेश से जुड़ा है। फैमिली कोर्ट ने पति आलोक तिवारी को अपनी पत्नी नेहा शुक्ला को 17 जून 2017, यानी मेंटेनेंस आवेदन दायर होने की तारीख से ₹20,000 प्रति माह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया था।
पति ने इस आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। उसका कहना था कि पत्नी एम.एससी. और बी.एड. शिक्षित है, ट्यूशन और कोचिंग से कमाई कर सकती है, इसलिए उसे मेंटेनेंस नहीं मिलना चाहिए। उसने यह भी दावा किया कि अब उसकी नियमित नौकरी नहीं है और वह फ्रीलांस चार्टर्ड अकाउंटेंट के रूप में अनियमित आय अर्जित कर रहा है।
अदालत की टिप्पणी
न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने सभी मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला था कि पत्नी के अलग रहने का उचित कारण था और पति ने उसके भरण-पोषण की उपेक्षा की।
अदालत ने कहा,
"सिर्फ इस आधार पर कि पत्नी शिक्षित है, उसे भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता। शिक्षा और कमाने की क्षमता महत्वपूर्ण पहलू हैं, लेकिन इन्हें वास्तविक और पर्याप्त आय के बराबर नहीं माना जा सकता।"हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि पति स्वयं एक योग्य चार्टर्ड अकाउंटेंट है, लेकिन उसने अपनी वास्तविक आय साबित करने के लिए आयकर रिटर्न, बैंक स्टेटमेंट या अन्य वित्तीय दस्तावेज अदालत में प्रस्तुत नहीं किए।
अदालत ने उसके बयानों का उल्लेख करते हुए कहा कि वह विभिन्न स्थानों पर पेशेवर रूप से कार्य करता रहा है, निजी कंसल्टेंसी करता है, उसके पास होंडा सिटी कार है और उसने पहले लगभग ₹90,000 प्रतिमाह आय होने की बात भी स्वीकार की थी। इन तथ्यों से उसकी आर्थिक क्षमता स्पष्ट होती है।
पीठ ने यह भी कहा,
"जब किसी व्यक्ति के पास अपनी आय से जुड़े सर्वोत्तम साक्ष्य हों और वह उन्हें प्रस्तुत न करे, तो अदालत उसके विरुद्ध प्रतिकूल अनुमान लगाने के लिए न्यायसंगत होती है।"सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
हाईकोर्ट ने Rajnesh v. Neha मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि मेंटेनेंस तय करते समय पति-पत्नी की सामाजिक स्थिति, पत्नी की उचित आवश्यकताओं, पति की आय और दायित्वों तथा वैवाहिक जीवन के दौरान मिले जीवन स्तर को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
अदालत ने पाया कि पत्नी की ऐसी कोई स्वतंत्र और पर्याप्त आय साबित नहीं हुई जिससे वह अपना भरण-पोषण स्वयं कर सके।
फैसला
सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पति की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (क्रिमिनल रिवीजन) खारिज कर दी। अदालत ने फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए निर्देश दिया कि पति 17 जून 2017 से ₹20,000 प्रति माह भरण-पोषण देता रहेगा। साथ ही, पहले से दिए गए अंतरिम भरण-पोषण की राशि का समायोजन करने की भी अनुमति दी गई।
Case Details:
Case Title: Alok Tiwari v. State of U.P. and Another
Case Number: Criminal Revision No. 5768 of 2024
Judge: Justice Garima Prashad
Decision Date: June 17, 2026


