लखनऊ की खचाखच भरी कोर्ट नंबर 1 में मंगलवार को एक बार फिर “चाइनीज मांझा” पर बहस हुई। मामला नया नहीं है, लेकिन घटनाएं थम नहीं रहीं। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने राज्य सरकार से दो टूक कहा कि सिर्फ सरकारी आदेश जारी करना काफी नहीं, ज़मीनी अमल भी दिखना चाहिए।
यह सुनवाई जनहित याचिका संख्या 13864/2018 और उससे जुड़ी एक अन्य याचिका पर हुई।
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मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता मोती लाल यादव ने 2018 में जनहित याचिका दाखिल कर मांग की थी कि चीन से आने वाले और सिंथेटिक मांझे के आयात, बिक्री और उपयोग पर पूरी तरह रोक लगाई जाए। उनका कहना था कि यह मांझा इंसानों और पक्षियों दोनों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है।
राज्य सरकार ने अपने जवाब में बताया कि 2016, 2017 और 2018 में कई सरकारी आदेश जारी किए जा चुके हैं। इन आदेशों के जरिए “सिंथेटिक/नायलॉन/लीड कोटेड मांझा” के निर्माण, भंडारण और बिक्री पर रोक लगाई गई है। यह भी बताया गया कि जिलाधिकारियों और पुलिस अधीक्षकों को कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे।
लेकिन कोर्ट के सामने रखी गई ताजा अख़बारी रिपोर्ट्स और घटनाओं ने एक अलग तस्वीर पेश की।
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हाल की घटनाएं और कोर्ट की चिंता
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने फरवरी 2026 की कई समाचार कटिंग्स अदालत के सामने रखीं। उनका दावा था कि इसी महीने में मांझे की वजह से करीब 10 लोगों की मौत या गंभीर चोटें हुईं।
पीठ ने कहा, “सिर्फ आदेश जारी कर देना पर्याप्त नहीं है। ज़िले और स्थानीय स्तर पर ईमानदार और लगातार प्रयास होने चाहिए।”
सरकार की ओर से मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने दलील दी कि “चाइनीज मांझा” शब्द भ्रम पैदा करता है। उनके अनुसार, यह जरूरी नहीं कि मांझा चीन से आयात हो रहा हो, बल्कि आम बोलचाल में सिंथेटिक या नायलॉन मांझे को ही “चाइनीज मांझा” कहा जाता है। उन्होंने यह भी बताया कि 9 और 10 फरवरी 2026 को प्रभावी रोक के लिए नए आदेश जारी किए गए हैं।
इस पर पीठ ने स्पष्ट कहा, “मुद्दा नाम का नहीं, उसके खतरनाक स्वरूप और उसके इस्तेमाल का है।”
पहले भी आ चुके हैं सख्त आदेश
अदालत ने अपने 2015 के आदेश का भी हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि पूरे प्रदेश में ऐसे मांझे के निर्माण और बिक्री पर रोक होनी चाहिए। उस आदेश में कहा गया था कि यह मांझा “रेजर की तरह तेज” होता है और गंभीर जानलेवा चोटें पहुंचा सकता है।
हाल ही में 14 जनवरी 2026 को भी एक अन्य जनहित याचिका में अदालत ने दोहराया था कि राज्य मशीनरी को खासकर पतंगबाजी के सीजन में सक्रिय रहना चाहिए ताकि किसी की जान जोखिम में न पड़े।
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कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने तल्ख लहजे में कहा, “ऐसा प्रतीत होता है कि जब तक कोई मौत या गंभीर हादसा सुर्खियों में नहीं आता, तब तक प्रशासन सक्रिय नहीं होता।”
पीठ ने जोर देकर कहा कि एक स्थायी और प्रभावी तंत्र (मैकेनिज्म) बनाना होगा, जिसमें-
- निर्माण और बिक्री पर वास्तविक निगरानी हो,
- कानून तोड़ने वालों पर कड़ी कार्रवाई हो,
- और यदि अधिकारी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाते, तो उनकी भी जवाबदेही तय हो।
अदालत ने यह भी चेतावनी दी कि अगर इसके बावजूद हादसे जारी रहे, तो राज्य को पीड़ितों को मुआवजा देने पर विचार करना पड़ सकता है।
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आगे की दिशा
पीठ ने राज्य सरकार से कहा कि वह एक नया शपथपत्र दाखिल करे। इसमें स्पष्ट रूप से बताया जाए कि-
- क्या मौजूदा कानून पर्याप्त हैं या नए प्रावधानों की जरूरत है,
- उल्लंघन करने वालों के खिलाफ जवाबदेही कैसे तय होगी,
- और स्थायी रोक के लिए कौन-सा ठोस तंत्र बनाया जाएगा।
साथ ही, अदालत ने जनजागरूकता अभियान चलाने पर भी जोर दिया ताकि समाज में ऐसे मांझे के खिलाफ व्यापक सहमति बने।
मामले की अगली सुनवाई 11 मार्च 2026 को तय की गई है। फिलहाल, अदालत ने राज्य को स्पष्ट संकेत दे दिया है-सिर्फ कागज़ी आदेश नहीं, जमीन पर असर दिखना चाहिए।
Case Title: Moti Lal Yadav vs. PMO & Others; Along with Rajjan Khan vs. State of U.P.
Case No.: PIL No. 13864 of 2018; PIL No. 499 of 2025
Decision Date: 11 February 2026










