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बच्चे के कपड़े के अंदर हाथ डालना, उसे घसीटना और चूमना यौन उत्पीड़न के दायरे में आता है: ओडिशा हाई कोर्ट

ओडिशा हाई कोर्ट ने 2023 में नियाली के एक घर में 12 साल से कम उम्र के बच्चे के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में दोषी ठहराए गए ग्राइंडर मैकेनिक की अपील खारिज कर दी और उसकी सात साल की सज़ा को बरकरार रखा। - बब्लू वर्मा बनाम ओडिशा राज्य

CB News Desk
बच्चे के कपड़े के अंदर हाथ डालना, उसे घसीटना और चूमना यौन उत्पीड़न के दायरे में आता है: ओडिशा हाई कोर्ट

उड़ीसा हाईकोर्ट, कटक ने एक अहम फैसले में बब्लू वर्मा नामक व्यक्ति की आपराधिक अपील खारिज कर दी है। यह अपील उसकी सात साल की सजा और दोषसिद्धि के खिलाफ दायर की गई थी। न्यायमूर्ति डॉ. संजीब के. पाणिग्रही ने 31 मार्च 2026 को सुनवाई की और 22 मई 2026 को फैसला सुनाया। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय में कोई खामी नहीं पाई।

मामले की पृष्ठभूमि

घटना 9 जुलाई 2023 की है। बब्लू वर्मा एक घूमने-फिरने वाला ग्राइंडर मिस्त्री था जो घर-घर जाकर मशीनें ठीक करता था। उस दिन वह नियाली, ओडिशा में एक घर में ग्राइंडर की मरम्मत के लिए आया था।

उस वक्त पीड़िता - जिसका जन्म 1 नवंबर 2014 को हुआ था, यानी घटना के समय उसकी उम्र महज 8 साल थी - और उसकी छोटी बहन घर के अंदर मौजूद थीं। घर की मालकिन (P.W.3) चाय बनाने के लिए रसोई में चली गई थीं।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी उस कमरे में घुस गया जहां बच्ची थी, उसे खींचा, उसके गाल और होंठों पर जबरदस्ती चुंबन किया और उसके कपड़ों के अंदर हाथ डाला। पीड़िता किसी तरह वहां से भागकर छिप गई। पीड़िता की मां ने नियाली पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज कराई - केस नंबर 246/2023।

आरोपी को उसी दिन गिरफ्तार कर लिया गया। जांच पूरी होने के बाद कटक की विशेष POCSO अदालत ने उसे IPC की धारा 452, 354 और 354-A तथा POCSO अधिनियम की धारा 10 और 12 के तहत दोषी करार दिया। सात साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई गई, साथ ही 10,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।

हाईकोर्ट में बब्लू वर्मा के वकील ने कई आधार पर सजा को चुनौती दी।

बचाव पक्ष ने कहा कि पीड़िता ने अदालत में कहा वो टेलीविजन देख रही थी, जबकि धारा 164 Cr.P.C. के तहत दर्ज बयान में उसने झूले पर खेलने जाने की बात कही थी। यह विरोधाभास था। इसके अलावा यह भी उठाया गया कि आरोपी को किस जगह पकड़ा गया - इस पर P.W.2 और जांच अधिकारी के बयानों में फर्क था। कोई टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड नहीं हुई। CCTV फुटेज रिकॉर्ड पर नहीं लाई गई। और जांच अधिकारी की पीड़िता के पिता से जो एक पत्रकार हैं पहले से जान-पहचान थी।

हाईकोर्ट ने हर तर्क को ध्यान से परखा।

बच्ची के बयान में टेलीविजन बनाम झूले की विसंगति पर अदालत ने कहा कि "ऐसे मामूली अंतर बाल गवाह की गवाही में स्वाभाविक होते हैं और इससे अभियोजन की मूल कहानी प्रभावित नहीं होती।"

पहचान के सवाल पर अदालत ने नोट किया कि पीड़िता ने आरोपी को लगातार "बब्लू अंकल" कहकर पहचाना और P.W.3 ने भी पुष्टि की कि वह पहले से उसके घर मरम्मत के लिए आता था। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब गवाह पहले से परिचित हों तो T.I. Parade न होना अपने आप में संदेह का आधार नहीं बनता।

उंगली डालने के आरोप पर अदालत ने ट्रायल कोर्ट के संतुलित दृष्टिकोण को सही ठहराया चूंकि यह बात धारा 164 के बयान में नहीं थी और चिकित्सा साक्ष्य से भी इसकी पुष्टि नहीं हुई, इसलिए IPC की धारा 376(AB) और POCSO की धारा 6 के तहत आरोपी को संदेह का लाभ दिया गया। लेकिन इससे बाकी दोषसिद्धि पर कोई असर नहीं पड़ा।

धारा 452 IPC के तहत घर में अनधिकृत प्रवेश के मामले में भी अदालत ने कहा कि आरोपी को केवल बरामदे में काम करने की अनुमति थी, लेकिन वह जानबूझकर कमरे के अंदर घुसा यह अपराध की मंशा से किया गया अतिक्रमण था।

जांच में पक्षपात के आरोप पर अदालत ने कहा कि दोषसिद्धि मुख्यतः पीड़िता की सुसंगत गवाही पर आधारित है, जो आसपास की परिस्थितियों से भी समर्थित है।

न्यायमूर्ति ने अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि और सजा को पूरी तरह बरकरार रखा। पीड़िता को ओडिशा पीड़ित मुआवजा योजना के तहत दिया गया 2,00,000 रुपये का मुआवजा भी यथावत रहेगा।

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