सुप्रीम कोर्ट ने एक विशेष परिस्थिति वाले POCSO मामले में आरोपी की दोषसिद्धि और सजा को रद्द करते हुए उसे बरी कर दिया है। अदालत ने यह राहत संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए दी। कोर्ट ने मामले में बाद में हुए घटनाक्रमों, पीड़िता और आरोपी के विवाह तथा पीड़िता की मुकदमा समाप्त करने की इच्छा को ध्यान में रखा।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि यह आदेश केवल इस मामले के असाधारण तथ्यों पर आधारित है और इसे किसी अन्य मामले में मिसाल (precedent) के रूप में नहीं देखा जाएगा।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला तमिलनाडु के धर्मपुरी जिले से जुड़ा है। ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2019 में आरोपी मरुथुपांडी को POCSO Act की धारा 5(1) और 6 के तहत दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ आरोपी ने मद्रास हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी, जहां उसकी सजा पर रोक लगा दी गई थी।
बाद में पीड़िता ने अदालत के समक्ष एक आवेदन और शपथपत्र दाखिल कर कहा कि वह आरोपी के साथ समझौता कर चुकी है और दोनों भविष्य में शांतिपूर्ण जीवन जीना चाहते हैं। उसने आरोपी के पक्ष में बयान दर्ज कराने की भी इच्छा जताई थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने यह आवेदन खारिज कर दिया, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पीड़िता का बयान मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज कराने का निर्देश दिया।
दिसंबर 2022 में दर्ज अपने बयान में पीड़िता ने कहा कि उसने शिकायत इसलिए दर्ज कराई थी क्योंकि आरोपी ने उससे विवाह करने से इनकार कर दिया था। उसने यह भी बताया कि बाद में उसका विवाह किसी अन्य व्यक्ति से हुआ, लेकिन वह संबंध अधिक समय तक नहीं चल सका।
इसके बाद फरवरी 2025 में दर्ज दूसरे बयान में पीड़िता ने बताया कि 5 दिसंबर 2024 को उसका विवाह मरुथुपांडी से हो चुका है। उसने कहा कि दोनों परिवारों और गांव के लोगों की सहमति से यह विवाह हुआ और वह आरोपी के साथ वैवाहिक जीवन जी रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने पीड़िता के विभिन्न बयानों, विवाह से जुड़े तथ्यों और बाद में सामने आए घटनाक्रमों का विस्तार से परीक्षण किया।
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि आरोपी ने पीड़िता को 10 लाख रुपये की राशि दी है, जिसे पीड़िता ने प्राप्त होने की पुष्टि की। अदालत के समक्ष उसने यह भी कहा कि वह अब मुकदमे को आगे नहीं बढ़ाना चाहती और यदि आरोपी की दोषसिद्धि रद्द कर दी जाए तो उसे कोई आपत्ति नहीं है।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से भी यह कहा गया कि वह मामले में सामने आए तथ्यों का विरोध नहीं कर रही है। हालांकि, राज्य ने आग्रह किया कि यदि कोई राहत दी जाए तो उसे भविष्य के मामलों में मिसाल के रूप में न माना जाए।
न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने कहा कि पीड़िता अब बालिग है, दोनों ने विवाह कर लिया है और वह स्वयं मुकदमे को समाप्त करना चाहती है।
पीठ ने कहा कि मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी किए बिना और केवल विशेष परिस्थितियों को देखते हुए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी पूर्ण शक्तियों का प्रयोग करना उचित होगा।
अदालत ने कहा कि बाद में हुए घटनाक्रमों को देखते हुए दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखना न्याय के हित में नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों अपीलों को स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा और दोषसिद्धि को रद्द कर दिया तथा आरोपी को आरोपों से बरी कर दिया।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह आदेश मामले की विशिष्ट परिस्थितियों को देखते हुए पारित किया गया है और इसे किसी अन्य मामले में कानूनी नज़ीर के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा।
इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि चूंकि आरोपी की सजा पहले ही निलंबित की जा चुकी थी, इसलिए उसे आत्मसमर्पण करने की आवश्यकता नहीं होगी और उसके जमानती बंधपत्र भी समाप्त माने जाएंगे।
Case Details
Case Title: Maruthupandi v. State Represented by the Inspector of Police & Anr.
Case Number: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 2782 of 2021 and SLP (Crl.) No. 4907 of 2021
Bench: Justice J.K. Maheshwari and Justice Atul S. Chandurkar
Decision Date: May 26, 2026

