इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में पुलिस जांच की गुणवत्ता सुधारने के लिए दिए गए अपने पूर्व निर्देशों के अनुपालन न होने पर गंभीर चिंता जताई है। एक नाबालिग लड़की की बरामदगी से जुड़ी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की सुनवाई के दौरान अदालत ने न केवल जांच की प्रक्रिया पर सवाल उठाए, बल्कि पुलिस सुधारों से संबंधित अपने पूर्व आदेशों के पालन की स्थिति की भी समीक्षा की।
न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने कहा कि न्यायालय द्वारा जारी निर्देशों की अनदेखी कानून के शासन और जवाबदेही की व्यवस्था को कमजोर कर सकती है।
मामला क्या था?
याचिकाकर्ता मेघा रैकवार ने अपनी 15 वर्षीय बेटी की बरामदगी के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। आरोप था कि जून 2025 में एक युवक नाबालिग लड़की को अपने साथ ले गया था। मामले में एफआईआर दर्ज हुई, आरोपी को गिरफ्तार भी किया गया और बाद में आरोपपत्र दाखिल कर दिया गया, लेकिन लड़की का लंबे समय तक कोई पता नहीं चल सका।
सुनवाई के दौरान अदालत ने केस डायरी और आरोपपत्र का अवलोकन किया। न्यायालय को प्रथम दृष्टया लगा कि जांच अपेक्षित निष्पक्षता, गंभीरता और प्रभावशीलता के साथ नहीं की गई।
अदालत ने पाया कि आरोपपत्र मुख्य रूप से आरोपी और कुछ गवाहों के बयानों के आधार पर दाखिल किया गया था। न्यायालय ने कहा कि जांच अधिकारी की कार्यप्रणाली कई गंभीर सवाल खड़े करती है।
कोर्ट ने अपने पूर्व निर्णय सुभाष चंद्र बनाम उत्तर प्रदेश राज्य में जारी निर्देशों का भी उल्लेख किया, जिनका उद्देश्य पुलिस जांच को अधिक वैज्ञानिक, निष्पक्ष और जवाबदेह बनाना था।
न्यायालय ने कहा कि विभिन्न जिलों से मंगाए गए आरोपपत्रों की समीक्षा से यह स्पष्ट हुआ कि इन निर्देशों का समान रूप से पालन नहीं किया जा रहा है।
अदालत ने टिप्पणी की, “रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री यह दर्शाती है कि अनेक मामलों में जांच एजेंसियां न्यायालय द्वारा निर्धारित आवश्यकताओं का पालन सुनिश्चित करने में विफल रही हैं।”
गृह विभाग की ओर से अदालत को बताया गया कि सुभाष चंद्र फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का निर्णय लिया गया है। राज्य का कहना था कि आरोपपत्र दाखिल करने से पहले अभियोजन अधिकारी द्वारा उसकी समीक्षा से जुड़े कुछ निर्देश कानूनी प्रश्न उठाते हैं, जिन पर सर्वोच्च न्यायालय का विचार आवश्यक है।
हालांकि हाईकोर्ट ने इस तर्क पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि फैसला मई 2025 में दिया गया था, लेकिन उसे चुनौती देने का निर्णय तब सामने आया जब न्यायालय ने फरवरी 2026 में अनुपालन न होने का कारण पूछा।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि सुनवाई के दौरान ऐसा कोई आदेश प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे यह पता चले कि प्रस्तावित विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुप्रीम कोर्ट ने कोई विचार किया है।
न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद के आचरण पर भी टिप्पणी की।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि प्रस्तावित एसएलपी का हवाला देकर न्यायालय के निर्देशों के पालन से जुड़े प्रश्नों को टालने का प्रयास किया गया, जबकि उस कानूनी उपाय को आगे बढ़ाने में अपेक्षित तत्परता नहीं दिखाई गई।
कोर्ट ने कहा कि यदि इस प्रकार का रवैया जारी रहता है तो जवाबदेही और पुलिस सुधारों से संबंधित न्यायिक निर्देश प्रभावहीन हो सकते हैं।
न्यायालय ने प्रशासनिक जवाबदेही को मजबूत करने के लिए “सुपीरियर रिस्पॉन्सिबिलिटी” (वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही) के सिद्धांत पर भी विचार करने की आवश्यकता जताई।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि नाबालिग लड़की को बरामद कर उसके माता-पिता की सुपुर्दगी में दे दिया गया है। इस कारण याचिका में उठाया गया मुख्य विवाद समाप्त हो गया।
इसके बाद हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण कर दिया।
साथ ही अदालत ने रजिस्ट्रार (कम्प्लायंस) को निर्देश दिया कि इस फैसले और सुभाष चंद्र मामले के आदेश की प्रमाणित प्रति भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को भेजी जाए, ताकि संबंधित अधिकारी की भविष्य की नियुक्तियों और उपयुक्तता के संदर्भ में आवश्यक विचार किया जा सके।
अदालत ने अंत में नाबालिग की बरामदगी में भूमिका निभाने वाले झांसी के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और पुलिस टीम के प्रयासों की सराहना भी की।
Case Details
Case Title: Megha Raikwar v. State of U.P. and 4 Others
Case Number: Habeas Corpus Writ Petition No. 946 of 2025
Judge: Justice Vinod Diwakar
Decision Date: June 3, 2026

