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प्रिंसिपल की मृत्यु के बाद पावर ऑफ अटॉर्नी से किया गया गिफ्ट डीड अमान्य, गुजरात हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द किया

गुजरात हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि प्रिंसिपल (अधिकार देने वाले व्यक्ति) की मौत के साथ ही पावर ऑफ़ अटॉर्नी खत्म हो जाती है और खास अधिकार के बिना इसका इस्तेमाल 'गिफ्ट डीड' (उपहार विलेख) को पूरा करने के लिए नहीं किया जा सकता; कोर्ट ने विवादित ट्रांसफर को अमान्य घोषित कर दिया। - पुरुषोत्तम रणछोड़भाई पंखनिया और अन्य बनाम हरिहर अंबालाल पटेल और अन्य।

CB News Desk
प्रिंसिपल की मृत्यु के बाद पावर ऑफ अटॉर्नी से किया गया गिफ्ट डीड अमान्य, गुजरात हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द किया

गुजरात हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके नाम पर कार्य करने के लिए दी गई पावर ऑफ अटॉर्नी स्वतः समाप्त हो जाती है। ऐसे में प्रधान (Principal) की मृत्यु के बाद पावर ऑफ अटॉर्नी धारक द्वारा निष्पादित किया गया उपहार विलेख (Gift Deed) कानून की दृष्टि में वैध नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति इलेश जे. वोरा और न्यायमूर्ति आर. टी. वाचानी की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट के निर्णय को रद्द कर दिया और प्रथम अपील स्वीकार कर ली।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद एक कृषि भूमि से जुड़ा था। रिकॉर्ड के अनुसार भूमि के मूल स्वामी ने अपने प्रतिनिधि को सामान्य पावर ऑफ अटॉर्नी (General Power of Attorney) प्रदान की थी। बाद में प्रधान की मृत्यु हो गई। इसके बावजूद पावर ऑफ अटॉर्नी धारक ने उसी अधिकार के आधार पर संबंधित संपत्ति का उपहार विलेख निष्पादित कर दिया।

इसके बाद इस उपहार विलेख की वैधता को अदालत में चुनौती दी गई। ट्रायल कोर्ट ने विलेख को सही माना था, जिसके विरुद्ध प्रथम अपील दायर की गई।

खंडपीठ ने कहा कि कॉन्ट्रैक्ट एक्ट की धारा 201, के अनुसार एजेंसी का संबंध प्रधान की मृत्यु के साथ समाप्त हो जाता है। इसलिए प्रधान के निधन के बाद पावर ऑफ अटॉर्नी धारक के पास उसके नाम पर कोई वैधानिक अधिकार शेष नहीं रहता।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सामान्य पावर ऑफ अटॉर्नी का अर्थ यह नहीं है कि एजेंट को बिना स्पष्ट अधिकार के संपत्ति उपहार में देने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। यदि दस्तावेज में ऐसा विशेष अधिकार नहीं दिया गया है, तो एजेंट उपहार विलेख निष्पादित नहीं कर सकता।

हाईकोर्ट ने पाया कि जिस समय उपहार विलेख निष्पादित किया गया, उस समय तक प्रधान का निधन हो चुका था। ऐसे में पावर ऑफ अटॉर्नी स्वतः समाप्त हो चुकी थी और उसके आधार पर किया गया उपहार विलेख कानूनी रूप से टिक नहीं सकता।

अदालत ने कहा कि इस प्रकार का दस्तावेज वैध स्वामित्व हस्तांतरित नहीं करता और उसे कानून के अनुसार मान्यता नहीं दी जा सकती।

इन निष्कर्षों के आधार पर गुजरात हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला और डिक्री रद्द कर दी। साथ ही प्रथम अपील स्वीकार करते हुए यह घोषित किया कि प्रधान की मृत्यु के बाद सामान्य पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर निष्पादित उपहार विलेख वैध नहीं है।

Case Details

Case Title: Purshotam Ranchhodbhai Pankhania & Ors. v. Harihar Ambalal Patel & Ors.

Case Number: R/First Appeal No. 259 of 2020

Judges: Justice Ilesh J. Vora and Justice R. T. Vachhani

Decision Date: 15 July 2026

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