लगभग 23 वर्षीय अविवाहित बेटी की उच्च शिक्षा के अधिकार को महत्वपूर्ण मानते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि पिता आर्थिक रूप से सक्षम है, तो वह अपनी वयस्क अविवाहित बेटी की स्नातकोत्तर (पोस्टग्रेजुएशन) चिकित्सा शिक्षा का खर्च वहन करने से केवल इस आधार पर बच नहीं सकता कि बेटी बालिग हो चुकी है। अदालत ने पिता को बेटी की एम.डी. मेडिकल पढ़ाई के लिए ₹16 लाख देने के निचली अदालतों के आदेश को बरकरार रखते हुए उनकी पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला उस समय शुरू हुआ जब याचिकाकर्ता की बेटी ने कर्नाटक परीक्षा प्राधिकरण (KEA) की काउंसलिंग के माध्यम से मंगलुरु स्थित फादर मुलर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च में एम.डी. डर्मेटोलॉजी पाठ्यक्रम में प्रवेश प्राप्त किया।
बेटी ने ट्रायल कोर्ट को बताया कि पहले वर्ष की ट्यूशन फीस, कॉलेज शुल्क, किताबें, उपकरण और अन्य शैक्षणिक खर्च मिलाकर लगभग ₹16 लाख की आवश्यकता है। उसने यह भी कहा कि प्रवेश शुल्क जमा करने के लिए उसे अपने दादा से लगभग ₹14 लाख उधार लेने पड़े और उसके पास पढ़ाई जारी रखने के लिए कोई स्वतंत्र आय का स्रोत नहीं है।
पिता ने इस मांग का विरोध करते हुए कहा कि उन्होंने पहले ही बेटी की एमबीबीएस की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाया है। उनके अनुसार बेटी अब बालिग है, पोस्टग्रेजुएशन करना उसका स्वयं का निर्णय है और वह मेडिकल रेजिडेंसी के दौरान स्टाइपेंड भी प्राप्त करेगी। इसलिए उससे आगे की पढ़ाई का खर्च वहन करने के लिए उन्हें बाध्य नहीं किया जा सकता।
हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 की धारा 20(d) के तहत पिता को ₹16 लाख देने का निर्देश दिया। अपीलीय अदालत ने भी इस आदेश को बरकरार रखा, जिसके बाद पिता ने कर्नाटक हाईकोर्ट का रुख किया।
अदालत की टिप्पणियां
न्यायमूर्ति एच.पी. संदेश ने सबसे पहले इस प्रश्न पर विचार किया कि क्या बालिग हो चुकी अविवाहित बेटी घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 20 के तहत अपनी उच्च शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता मांग सकती है।
अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि बेटी ने पीजी-नीट परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 11,722 हासिल की थी और विधिवत काउंसलिंग के माध्यम से एम.डी. पाठ्यक्रम में प्रवेश प्राप्त किया था। रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट हुआ कि उसने प्रवेश शुल्क जमा करने के लिए अपने दादा से उधार ली गई राशि का उपयोग किया था।
हाईकोर्ट ने पिता की आर्थिक स्थिति पर भी विस्तार से विचार किया। अदालत ने पाया कि उनके आयकर रिटर्न, बैंक रिकॉर्ड और विभिन्न ऋणों से जुड़े दस्तावेज बताते हैं कि उन्होंने करोड़ों रुपये के लेन-देन किए हैं तथा पर्याप्त संपत्तियां अर्जित की हैं। इसलिए यह निष्कर्ष उचित था कि वह बेटी की शिक्षा का खर्च उठाने में सक्षम हैं।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के नीलिमा चौरे बनाम विजय चौरे फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि बेटी को शिक्षा प्राप्त करने का कानूनी रूप से लागू किया जा सकने वाला अधिकार है और माता-पिता अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार उसकी शिक्षा का खर्च वहन करने के लिए बाध्य किए जा सकते हैं।
इसके अलावा हाईकोर्ट ने घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 20 की व्याख्या करते हुए कहा कि इसमें प्रयुक्त "but is not limited to" शब्द यह दर्शाते हैं कि मौद्रिक राहत केवल सामान्य भरण-पोषण तक सीमित नहीं है। परिस्थितियों के अनुसार इसमें शिक्षा संबंधी खर्च भी शामिल किया जा सकता है।
अदालत ने पिता की इस दलील को भी स्वीकार नहीं किया कि बेटी बालिग होने के कारण शिक्षा ऋण लेकर अपनी पढ़ाई पूरी करे। अदालत ने कहा कि एमबीबीएस से पोस्टग्रेजुएशन तक की पढ़ाई उसी शैक्षणिक यात्रा का विस्तार है और चूंकि बेटी की स्वयं की कोई आय नहीं है, इसलिए यह तथ्य महत्वपूर्ण है।
अदालत ने कहा, "बेटी को शिक्षा प्राप्त करने का मौलिक अधिकार है और माता-पिता को अपनी आर्थिक क्षमता के भीतर उसकी शिक्षा के लिए आवश्यक धन उपलब्ध कराने के लिए बाध्य किया जा सकता है।"
अदालत ने आगे कहा कि "पिता का दायित्व है कि वह बेटी की स्नातक ही नहीं बल्कि स्नातकोत्तर शिक्षा का खर्च भी वहन करे।"
फैसला
सभी तथ्यों और रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री का परीक्षण करने के बाद न्यायमूर्ति एच.पी. संदेश ने पाया कि ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत के आदेशों में किसी प्रकार की कानूनी या तथ्यात्मक त्रुटि नहीं है।
परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने पिता की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी और बेटी की पोस्टग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा के लिए ₹16 लाख का भुगतान करने संबंधी आदेश को बरकरार रखा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल बेटी के बालिग हो जाने से, इस मामले की परिस्थितियों में, उसके शिक्षा खर्च का दावा स्वतः समाप्त नहीं हो जाता।
Case Details
Case Title: Vincent Correa v. Viyola Prathvi Correa
Case Number: Criminal Revision Petition No. 870 of 2026
Judge: Justice H.P. Sandesh
Decision Date: 17 July 2026

