केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सड़क दुर्घटना में घायल हुए पिलियन राइडर (मोटरसाइकिल के पीछे बैठा यात्री) का मुआवजा केवल इसलिए कम नहीं किया जा सकता क्योंकि मोटरसाइकिल चालक की ओर से कथित लापरवाही रही हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी यात्री पर चालक की लापरवाही का प्रभाव स्वतः नहीं डाला जा सकता। न्यायमूर्ति अनिल के. नरेंद्रन ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें मुआवजे में 50 प्रतिशत की कटौती की गई थी और घायल दावेदार को अतिरिक्त मुआवजा देने का निर्देश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह अपील संतोष द्वारा दायर की गई थी, जो 28 जून 2004 को एक मोटरसाइकिल पर पीछे बैठे यात्री के रूप में यात्रा कर रहे थे। इसी दौरान मोटरसाइकिल की टक्कर एक स्टेज कैरिज बस से हुई, जिसके मालिक ई.ए. साइनाबा, चालक फज़लुद्दीन और बीमाकर्ता न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड थे। दुर्घटना में संतोष को गंभीर चोटें आईं और उन्होंने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, एर्नाकुलम के समक्ष मुआवजे की मांग की।
अधिकरण ने कुल ₹57,922 का मुआवजा निर्धारित किया, लेकिन यह कहते हुए कि मोटरसाइकिल चालक भी दुर्घटना के लिए 50 प्रतिशत जिम्मेदार था, दावेदार के मुआवजे में आधी कटौती कर दी। इसके बाद संतोष को केवल ₹28,961 और ब्याज प्रदान किया गया। इसी आदेश को चुनौती देते हुए उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अदालत की टिप्पणी
न्यायमूर्ति अनिल के. नरेंद्रन ने कहा कि अधिकरण ने बिना पर्याप्त कानूनी आधार के मोटरसाइकिल चालक पर योगदानात्मक लापरवाही (Contributory Negligence) मान ली और उसका असर सीधे पिलियन राइडर के मुआवजे पर डाल दिया।
अदालत ने पाया कि पुलिस द्वारा दाखिल आरोपपत्र केवल स्टेज कैरिज बस के चालक के खिलाफ था। मोटरसाइकिल चालक के विरुद्ध न तो कोई आरोपपत्र था और न ही ऐसा कोई मौखिक साक्ष्य पेश किया गया जिससे उसकी लापरवाही साबित होती। ऐसे में केवल घटनास्थल के दस्तावेजों या वाहन निरीक्षण रिपोर्ट के आधार पर पिलियन राइडर का मुआवजा कम करना कानून के अनुरूप नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट के यशवंत कृष्णा कुंबर फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि योगदानात्मक लापरवाही तय करने के लिए यह देखना जरूरी है कि घायल व्यक्ति ने स्वयं दुर्घटना में किस प्रकार योगदान दिया। यदि घायल केवल पीछे बैठा यात्री है, तो चालक की कथित लापरवाही उसके खिलाफ नहीं मानी जा सकती।
अदालत ने कहा,
"योगदानात्मक लापरवाही का सिद्धांत घायल व्यक्ति के अपने आचरण की अलग से जांच की मांग करता है। केवल चालक के व्यवहार के आधार पर पिलियन राइडर को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।"मुआवजे में बढ़ोतरी
हाईकोर्ट ने केवल 50 प्रतिशत कटौती ही समाप्त नहीं की, बल्कि मुआवजे के कई अन्य मदों की भी दोबारा समीक्षा की।
अदालत ने दावेदार की अनुमानित मासिक आय ₹3,500 से बढ़ाकर ₹4,500 निर्धारित की। अदालत ने कहा कि वर्ष 2004 में हुई दुर्घटना के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सिद्धांतों को देखते हुए अधिकरण द्वारा निर्धारित आय पर्याप्त नहीं थी।
इसके अलावा चिकित्सा खर्च, अतिरिक्त पोषण, कपड़ों की क्षति और आय के नुकसान जैसी मदों में भी मुआवजा बढ़ाया गया। हालांकि दर्द एवं पीड़ा तथा जीवन की सुविधाओं के नुकसान के लिए अतिरिक्त राशि देने से अदालत ने इनकार किया, क्योंकि स्थायी दिव्यांगता या आय पर उसके प्रभाव का कोई विश्वसनीय साक्ष्य रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं था।
ब्याज के मुद्दे पर भी अदालत ने स्पष्ट किया कि दावेदार को दावा याचिका दायर करने की तारीख से ब्याज मिलेगा, लेकिन जिस अवधि तक मामला उसकी देरी के कारण लंबित रहा, उस अवधि का ब्याज देय नहीं होगा।
अदालत का फैसला
हाईकोर्ट ने अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए दावेदार को ₹45,389 की अतिरिक्त क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया। इस राशि में अधिकरण द्वारा गलत तरीके से काटे गए 50 प्रतिशत मुआवजे की बहाली के साथ अन्य मदों में की गई बढ़ोतरी भी शामिल है।
अदालत ने न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को निर्देश दिया कि वह प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के दो महीने के भीतर अतिरिक्त मुआवजा, निर्धारित अवधि का 8 प्रतिशत वार्षिक ब्याज तथा आनुपातिक लागत दावेदार के बैंक खाते में जमा करे।
Case Details
Case Title: Santhosh v. E.A. Sainaba & Others
Case Number: MACA No. 947 of 2011
Judge: Justice Anil K. Narendran
Decision Date: 18 June 2026

