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'निवास की शर्त कोई मामूली औपचारिकता नहीं है': बॉम्बे हाई कोर्ट ने पते के सबूत के आधार पर RTE एडमिशन रद्द करने के फैसले को सही ठहराया।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने आरटीई कोटे के तहत प्रवेश से इनकार को सही ठहराते हुए कहा कि पड़ोस श्रेणी में पात्रता साबित करने के लिए वास्तविक निवास का विश्वसनीय प्रमाण देना अनिवार्य है। - मानस संदीप साठे बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य

CB News Desk
'निवास की शर्त कोई मामूली औपचारिकता नहीं है': बॉम्बे हाई कोर्ट ने पते के सबूत के आधार पर RTE एडमिशन रद्द करने के फैसले को सही ठहराया।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम के तहत स्कूल में प्रवेश मांग रहे एक नाबालिग छात्र की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि आरटीई के तहत पड़ोस (Neighbourhood) श्रेणी में प्रवेश पाने के लिए वास्तविक निवास का प्रमाण देना अनिवार्य है और केवल तकनीकी त्रुटि का हवाला देकर इस शर्त से छूट नहीं दी जा सकती।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिका नाबालिग मानस संदीप साठे की ओर से उनके पिता ने दायर की थी। याचिकाकर्ता ने पुणे स्थित पोदार इंटरनेशनल स्कूल में शैक्षणिक वर्ष 2026-27 के लिए आरटीई कोटे के तहत प्रवेश देने का निर्देश देने की मांग की थी।

याचिका में कहा गया कि परिवार अगस्त 2025 से खराड़ी, पुणे स्थित एक फ्लैट में रह रहा है, जो स्कूल से लगभग 950 मीटर की दूरी पर है। इस आधार पर छात्र ने खुद को आरटीई अधिनियम के तहत पड़ोस श्रेणी का पात्र बताया।

हालांकि, ऑनलाइन आवेदन इस आधार पर अस्वीकार कर दिया गया कि प्रस्तुत निवास प्रमाण संतोषजनक नहीं था। याचिकाकर्ता का कहना था कि आवेदन में दिखाई गई पते की विसंगति केवल गूगल मैप्स की ऑटो-जनरेटेड त्रुटि थी और अधिकारियों को वास्तविक निवास का भौतिक सत्यापन करना चाहिए था। शिक्षा अधिकारियों ने अपील भी खारिज कर दी, जिसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा।

अदालत की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि आवेदन में दिए गए पते का मौके पर जाकर सत्यापन किया जाए।

सत्यापन रिपोर्ट में पाया गया कि जिस स्थान को याचिकाकर्ता ने अपना निवास बताया था, वहां परिवार के नियमित रूप से रहने के पर्याप्त संकेत नहीं मिले। अधिकारियों ने बताया कि पहली मंजिल पर केवल एक बिस्तर था, जबकि भूतल पर याचिकाकर्ता की मां एक छोटा भोजनालय संचालित कर रही थीं।

अदालत ने यह भी पाया कि आवेदन पत्र, लीज एग्रीमेंट, आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र में दर्ज पते एक-दूसरे से मेल नहीं खाते।

पीठ ने कहा,

"गूगल के ऑटो-जनरेटेड पते में त्रुटि होने का दावा वास्तविक निवास के प्रमाण का विकल्प नहीं हो सकता।"

इसके साथ ही अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा,

"निवास संबंधी शर्त कोई महज औपचारिकता नहीं है, बल्कि आरटीई के आरक्षित कोटे में प्रवेश के लिए यह एक आवश्यक पात्रता है।"

पीठ ने कहा कि यदि बिना पर्याप्त प्रमाण के इस शर्त को नजरअंदाज किया जाए तो इससे उस जरूरतमंद बच्चे का अधिकार प्रभावित हो सकता है, जो वास्तव में पड़ोस संबंधी पात्रता पूरी करता हो।

अदालत का फैसला

सभी दस्तावेजों और सत्यापन रिपोर्ट पर विचार करने के बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने माना कि शिक्षा अधिकारियों ने आवेदन खारिज करने में कोई कानूनी त्रुटि नहीं की। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता वास्तविक निवास साबित करने में सफल नहीं हुआ।

इसी आधार पर हाई कोर्ट ने याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने लागत (Costs) को लेकर कोई आदेश पारित नहीं किया।

Case Details

Case Title: Manas Sandip Sathe v. State of Maharashtra & Others

Case Number: Writ Petition No. 7601 of 2026

Judge: Acting Chief Justice Ravindra V. Ghuge and Justice Gautam A. Ankhad

Decision Date: 25 June 2026

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