उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कारोबारी राकेश मेहरा और उनकी दो बेटियों द्वारा दायर उन याचिकाओं को खारिज कर दिया है, जिनमें धोखाधड़ी के एक आपराधिक मामले से जुड़ी एफआईआर, चार्जशीट और आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की गई थी। अदालत ने कहा कि जांच में पर्याप्त सामग्री सामने आई है जिससे मुकदमे की सुनवाई जारी रहनी चाहिए। साथ ही स्पष्ट किया कि घोषित अपराधी (Proclaimed Offender) पावर ऑफ अटॉर्नी धारक के माध्यम से हाईकोर्ट से राहत नहीं मांग सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 7 जून 2022 को हरिद्वार के कनखल थाने में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि राकेश मेहरा की कंपनियों और दिव्य फार्मेसी तथा पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड के बीच वर्षों से चले आ रहे कारोबारी लेन-देन के दौरान कथित धोखाधड़ी हुई।
राकेश मेहरा का कहना था कि विवाद पूरी तरह व्यावसायिक प्रकृति का है और यदि कोई विवाद था भी, तो उसका समाधान सिविल कोर्ट या मध्यस्थता (Arbitration) के जरिए होना चाहिए था, न कि आपराधिक मुकदमे के माध्यम से।
उनकी बेटियों ने भी अदालत में कहा कि उनका विवादित कारोबारी लेन-देन से कोई संबंध नहीं था और उनके खातों में जो रकम आई, वह पारिवारिक समझौते (Family Settlement) के तहत हस्तांतरित की गई थी।
अदालत की टिप्पणी
न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल ने सबसे पहले इस प्रश्न पर विचार किया कि क्या राकेश मेहरा अपनी पावर ऑफ अटॉर्नी धारक के माध्यम से धारा 482 सीआरपीसी के तहत याचिका दायर कर सकते हैं।
अदालत ने इस पर स्पष्ट शब्दों में कहा,
"घोषित अपराधी या कानून की प्रक्रिया से बचने वाला आरोपी पावर ऑफ अटॉर्नी धारक के माध्यम से हाईकोर्ट के समक्ष धारा 482 सीआरपीसी के तहत राहत नहीं मांग सकता।"
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि राकेश मेहरा जांच में शामिल नहीं हुए, उनके खिलाफ लुकआउट सर्कुलर जारी किया गया, उन्हें उद्घोषित अपराधी घोषित किया गया और इसके बावजूद उन्होंने ट्रायल कोर्ट के समक्ष भी उपस्थिति दर्ज नहीं कराई।
अदालत ने यह भी माना कि विदेश में रहने या अन्य मामलों में फंसाए जाने की आशंका, न्यायिक प्रक्रिया से बचने का वैध आधार नहीं हो सकती।
सिविल विवाद होने की दलील भी नहीं मानी
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि मामला केवल व्यावसायिक लेन-देन से जुड़ा है, इसलिए इसे आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता।
हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी ने बैंक रिकॉर्ड, ऑडिट रिपोर्ट और चार्टर्ड अकाउंटेंट की रिपोर्ट सहित कई दस्तावेजी साक्ष्य एकत्र किए हैं। अदालत ने यह भी नोट किया कि एफआईआर दर्ज होने के बाद बड़ी रकम राकेश मेहरा की बेटियों के खातों में स्थानांतरित किए जाने का आरोप जांच में सामने आया है।
पीठ ने कहा,
"यदि शिकायत से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो केवल इस आधार पर कि पक्षों के बीच व्यावसायिक संबंध थे, आपराधिक कार्यवाही समाप्त नहीं की जा सकती। सिविल और आपराधिक दायित्व साथ-साथ मौजूद रह सकते हैं।"
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 482 सीआरपीसी या रिट अधिकारिता का प्रयोग करते समय वह साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन नहीं कर सकती। यह कार्य ट्रायल कोर्ट का है।
फैसला
इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राकेश मेहरा और उनकी बेटियों की दोनों याचिकाएं खारिज कर दीं। अदालत ने पहले दिए गए सभी अंतरिम आदेश भी समाप्त कर दिए और ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह मामले की सुनवाई कानून के अनुसार आगे बढ़ाए, बिना इस निर्णय में की गई टिप्पणियों से प्रभावित हुए।
Case Details
Case Title: Rakesh Mehra v. State of Uttarakhand & Others
Case Number: Criminal Misc. Application No. 135 of 2024 & Writ Petition (Criminal) No. 159 of 2023
Judge: Justice Rakesh Thapliyal
Decision Date: 17 June 2026

