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IBC में CoC की 'कमर्शियल विजडम' सर्वोपरि: सुप्रीम कोर्ट ने टोरेंट, वैंटेज और जिंदल की अपीलें खारिज कीं

टोरेंट पावर लिमिटेड बनाम आशीष अर्जुनकुमार राठी और अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने टोरेंट पावर, वैंटेज और जिंदल की IBC अपीलें खारिज कीं, कहा CoC की ‘commercial wisdom’ में दखल नहीं।

Vivek G.
IBC में CoC की 'कमर्शियल विजडम' सर्वोपरि: सुप्रीम कोर्ट ने टोरेंट, वैंटेज और जिंदल की अपीलें खारिज कीं

नई दिल्ली की अदालत में सुनवाई के दौरान एक बार फिर साफ हो गया कि दिवाला प्रक्रिया में अंतिम निर्णय का अधिकार वित्तीय लेनदारों की समिति-यानी CoC-के पास ही है। सुप्रीम कोर्ट ने टोरेंट पावर, वैंटेज प्वाइंट और जिंदल पावर की अपीलों को खारिज करते हुए कहा कि CoC के व्यावसायिक फैसलों में दखल की गुंजाइश बहुत सीमित है।

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना की पीठ ने अपने फैसले में दो टूक कहा कि अदालतें आर्थिक निर्णयों की पुनः समीक्षा नहीं कर सकतीं, जब तक कि कोई स्पष्ट कानूनी उल्लंघन या गंभीर प्रक्रिया त्रुटि साबित न हो।

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मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद SKS पावर जनरेशन (छत्तीसगढ़) लिमिटेड की कॉर्पोरेट दिवाला प्रक्रिया से जुड़ा था। बैंक ऑफ बड़ौदा की याचिका पर कंपनी के खिलाफ CIRP शुरू हुआ। बाद में कई कंपनियों ने समाधान योजना (Resolution Plan) पेश की, जिनमें टोरेंट पावर, वैंटेज प्वाइंट, जिंदल पावर और सर्दा एनर्जी एंड मिनरल्स लिमिटेड (SEML) शामिल थे।

CoC ने 100% वोट से SEML की योजना को मंजूरी दे दी। इसके बाद असफल बोलीदाताओं ने आरोप लगाया कि SEML को बोली प्रक्रिया खत्म होने के बाद अपने प्रस्ताव में बदलाव की अनुमति दी गई, जो नियमों के खिलाफ है।

पहले National Company Law Tribunal (NCLT) और फिर National Company Law Appellate Tribunal (NCLAT) ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। मामला आखिरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

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विवाद के मुख्य मुद्दे

अपीलकर्ताओं ने दो प्रमुख आरोप लगाए:

  1. SEML ने बैंक गारंटी (BG) के लिए अपनी राशि 103.39 करोड़ रुपये से बढ़ाकर लगभग 180 करोड़ रुपये कर दी।
  2. 240 करोड़ रुपये की स्थगित (Deferred) राशि को अग्रिम (Upfront) भुगतान में बदल दिया गया।

टोरेंट का कहना था कि इससे प्रक्रिया में “भेदभाव” और “अनियमितता” हुई। वैंटेज और जिंदल ने भी तर्क दिया कि उनकी योजनाएं वित्तीय दृष्टि से बेहतर थीं और अधिक मूल्य प्रदान करती थीं।

अदालत की टिप्पणी

पीठ ने पहले अपील की सीमा पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि IBC की धारा 61 और 62के तहत अपील केवल कानून के प्रश्न पर ही संभव है।

फैसले में कहा गया, “जहां दो प्राधिकरणों ने एक समान निष्कर्ष निकाला है, वहां सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप नहीं करेगा, जब तक कि निर्णय स्पष्ट रूप से अवैध या मनमाना न हो।”

बैंक गारंटी पर स्पष्टीकरण

अदालत ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए पाया कि 180.05 करोड़ रुपये की पूरी मार्जिन मनी योजना में शुरू से शामिल थी। 103.39 करोड़ रुपये केवल उन गारंटियों के लिए ताजा निवेश था जिन्हें जारी रखना था। बाकी गारंटियां समाप्त होनी थीं, इसलिए उनकी मार्जिन मनी भी CoC को मिलनी थी।

पीठ ने कहा, “स्पष्टीकरण से CoC को मिलने वाली राशि में कोई वृद्धि नहीं हुई। यह मात्र स्पष्टता के लिए था।”

SEML ने अपनी योजना में 240 करोड़ रुपये के डिबेंचर (NCD) जारी करने का प्रस्ताव रखा था, जिन पर ब्याज सहित कुल राशि लगभग 301.64 करोड़ रुपये बनती। CoC के पास विकल्प था-या तो यह राशि समय के साथ ले या 240 करोड़ रुपये अभी ले ले।

अदालत ने कहा कि 240 करोड़ रुपये पहले से ही वर्तमान मूल्य (NPV) के रूप में दर्शाए गए थे। इसलिए इसे “बदलाव” नहीं माना जा सकता।

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Commercial Wisdom पर स्पष्ट रुख

पीठ ने दोहराया कि CoC का व्यावसायिक निर्णय सर्वोपरि है। अदालत ने कहा, “अदालतें आर्थिक मूल्यांकन में अपनी राय नहीं थोप सकतीं। CoC ही वह निकाय है जो जोखिम और व्यवहार्यता का आकलन करने में सक्षम है।”

यह भी कहा गया कि Resolution Professional ने केवल CoC के निर्देशों का पालन किया। ऐसे में “material irregularity” का आरोप टिकता नहीं।

अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि न तो प्रक्रिया में कोई गंभीर अनियमितता थी और न ही कानून का उल्लंघन। चूंकि NCLT और NCLAT दोनों ने एक समान निष्कर्ष दिया था और योजना लागू भी हो चुकी थी, अदालत ने हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।

तीनों अपीलें खारिज कर दी गईं।

Case Title: Torrent Power Ltd. v. Ashish Arjunkumar Rathi & Ors.

Case No.: Civil Appeal Nos. 11746-11747 of 2024 (with connected matters)

Decision Date: 2026

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