पारदर्शिता और सूचना के अधिकार से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है कि मध्य प्रदेश लोकायुक्त संगठन के तहत कार्यरत विशेष पुलिस स्थापना (SPE) को केवल सरकारी अधिसूचना के आधार पर सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम से बाहर नहीं रखा जा सकता।
न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने SPE की अपील खारिज करते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें एक आरटीआई आवेदक को मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला कमता प्रसाद मिश्रा से जुड़ा है, जो उस समय कटनी जिले के माधवनगर थाने में टाउन इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत थे। उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत SPE द्वारा दर्ज एक ट्रैप मामले में जांच की गई थी।
राज्य सरकार ने मई 2020 में उनके अभियोजन की स्वीकृति प्रदान की थी। इसके बाद मिश्रा ने 1 जुलाई 2020 को RTI आवेदन दाखिल कर यह जानकारी मांगी कि उनके अभियोजन की स्वीकृति किस प्रक्रिया से दी गई और इस संबंध में क्या पत्राचार हुआ।
संबंधित अधिकारियों ने सूचना देने से इनकार कर दिया। बाद में राज्य सूचना आयोग ने भी यह कहते हुए अपील खारिज कर दी कि RTI अधिनियम की धारा 8(1)(h) के तहत ऐसी जानकारी रोकी जा सकती है, जिससे जांच या अभियोजन प्रभावित हो सकता हो।
हालांकि, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पाया कि जांच पूरी हो चुकी थी और चार्जशीट भी दाखिल की जा चुकी थी। इसलिए सूचना देने से इनकार करने का आधार नहीं बचता। इसके बाद SPE ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट में SPE ने 25 अगस्त 2011 की एक अधिसूचना का सहारा लिया। यह अधिसूचना मध्य प्रदेश सरकार ने RTI अधिनियम की धारा 24(4) के तहत जारी की थी।
इस अधिसूचना में कहा गया था कि लोकायुक्त संगठन की विशेष पुलिस स्थापना और आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो द्वारा जांच किए जा रहे मामलों पर RTI अधिनियम लागू नहीं होगा।सुनवाई के दौरान पीठ ने महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि क्या SPE को वास्तव में “इंटेलिजेंस और सिक्योरिटी ऑर्गेनाइजेशन” माना जा सकता है, क्योंकि धारा 24(4) के तहत केवल ऐसे संगठनों को ही RTI से छूट दी जा सकती है।
अदालत की टिप्पणी
अदालत ने लोकायुक्त संगठन, SPE और संबंधित कानूनों का विस्तृत अध्ययन किया। पीठ ने पाया कि SPE का कार्यक्षेत्र मुख्य रूप से भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों और कुछ विशेष आपराधिक मामलों की जांच तक सीमित है।
पीठ ने कहा, “SPE को RTI अधिनियम, 2005 की धारा 24(4) के उद्देश्य से ‘इंटेलिजेंस और सिक्योरिटी ऑर्गेनाइजेशन’ नहीं माना जा सकता।”अदालत ने यह भी कहा कि लोकायुक्त व्यवस्था का गठन सार्वजनिक सेवकों के खिलाफ भ्रष्टाचार और कदाचार के आरोपों की जांच के लिए किया गया था, न कि खुफिया या सुरक्षा गतिविधियों के लिए।
राज्य सरकार ने यह तर्क दिया था कि कुछ केंद्रीय एजेंसियों की तरह SPE को भी समान संरक्षण मिलना चाहिए। लेकिन अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और कहा कि उन एजेंसियों के कार्य और उद्देश्य पूरी तरह अलग हैं।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी अधीनस्थ कानून या सरकारी अधिसूचना को मूल कानून की सीमाओं के भीतर रहना होता है। यदि कोई अधिसूचना कानून द्वारा दी गई शक्ति से आगे जाती है, तो अदालत उसे रद्द कर सकती है।
फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 25 अगस्त 2011 की अधिसूचना, जहां तक वह SPE को RTI अधिनियम के दायरे से बाहर करती है, धारा 24(4) के अनुरूप नहीं है और कानूनन टिक नहीं सकती।
पीठ ने कहा, “25.08.2011 की अधिसूचना RTI अधिनियम की धारा 24(4) के अनुरूप नहीं है और इस सीमा तक यह अत्यधिक तथा अवैध है।”इसके साथ ही अदालत ने अधिसूचना को SPE के संबंध में रद्द कर दिया और हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें कमता प्रसाद मिश्रा को मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो के संबंध में अधिसूचना की वैधता पर कोई विचार नहीं किया है। इसलिए उस एजेंसी पर यह अधिसूचना फिलहाल लागू रहेगी।
इन्हीं निष्कर्षों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक अपील खारिज कर दी।
Case Details:
Case Title: Special Police Establishment v. Kamta Prasad Mishra & Others
Case Number: Criminal Appeal No. 3743 of 2024
Bench: Justice J.K. Maheshwari and Justice Atul S. Chandurkar
Decision Date: June 15, 2026


