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2007 अजमेर दरगाह ब्लास्ट मामला फिर खुला, सुप्रीम कोर्ट ने सात आरोपियों की बरी पर ख्वाजा गरीब नवाज़ के खादिम की याचिका पर नोटिस जारी किया

सुप्रीम कोर्ट ने 2007 अजमेर दरगाह ब्लास्ट मामले में सात आरोपियों की बरी को चुनौती देने वाली याचिका पर राजस्थान को नोटिस जारी किया।

Vivek G.
2007 अजमेर दरगाह ब्लास्ट मामला फिर खुला, सुप्रीम कोर्ट ने सात आरोपियों की बरी पर ख्वाजा गरीब नवाज़ के खादिम की याचिका पर नोटिस जारी किया

नई दिल्ली, 3 अक्टूबर - सुप्रीम कोर्ट ने 2007 के अजमेर दरगाह विस्फोट मामले में एक बार फिर से सुनवाई का रास्ता खोल दिया है। अदालत ने अजमेर दरगाह शरीफ के खादिम सैयद सरवर चिश्ती की याचिका पर राजस्थान राज्य को नोटिस जारी किया है। चिश्ती ने राजस्थान हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें विशेष एनआईए अदालत द्वारा सात आरोपियों को बरी करने का आदेश बरकरार रखा गया था।

यह नोटिस जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने जारी किया, जिससे राजस्थान के सबसे संवेदनशील मामलों में से एक में नया मोड़ आया है।

पृष्ठभूमि

11 अक्टूबर 2007 को हुए अजमेर दरगाह विस्फोट में शाम की नमाज़ के दौरान तीन लोगों की मौत हो गई थी और कई घायल हुए थे। यह दरगाह भारत के सबसे पवित्र सूफी स्थलों में से एक मानी जाती है।

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राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने बाद में कुछ दक्षिणपंथी समूहों से जुड़े आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया था।

2017 में विशेष एनआईए अदालत ने देवेंद्र गुप्ता और भावेश पटेल को दोषी ठहराया, जबकि सात अन्य - लोकेश शर्मा, चंद्रशेखर लेवे, मुकेश वसानी, हर्षद उर्फ मुन्ना उर्फ राज, नबाकुमार सरकार उर्फ स्वामी असीमानंद, माफत उर्फ मेहुल, और भरत मोहनलाल रतेश्वर - को बरी कर दिया गया।

इन बरी किए गए आरोपियों के खिलाफ शिकायतकर्ता की अपील 2017 में दायर की गई थी, लेकिन लगभग पाँच साल तक सुनवाई नहीं हुई। आखिरकार मई 2022 में राजस्थान हाई कोर्ट ने इसे 1135 दिनों की देरी का हवाला देते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि यह देरी एनआईए अधिनियम की धारा 21(5) के तहत तय 90 दिन की सीमा से अधिक है, जिसे माफ नहीं किया जा सकता।

अदालत की टिप्पणियाँ

नई दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि वह यह जांचना चाहेगी कि क्या हाई कोर्ट ने कानून की बहुत सख्त व्याख्या कर दी थी।

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याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभय महादेव टिप्से ने दलील दी कि 90 दिनों की सख्त अपील सीमा पीड़ितों को न्याय पाने के अधिकार से वंचित कर देती है। उन्होंने कहा कि यह प्रावधान एनआईए मामलों और सामान्य आपराधिक मामलों के बीच “अनुचित असमानता” पैदा करता है।

पीठ ने इस तर्क पर ध्यान दिया कि ऐसी व्याख्या संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 - समानता और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन कर सकती है। सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा, “अगर कानून को इतना सख्ती से पढ़ा जाए कि न्याय शुरू होने से पहले ही रुक जाए, तो फिर कानून पर खुद विचार करने की जरूरत है।”

याचिका में मंगू राम बनाम दिल्ली नगर निगम और मोहम्मद अबाद अली बनाम राजस्व खुफिया निदेशालय जैसे फैसलों का भी हवाला दिया गया, जिनमें यह कहा गया था कि अपील का अधिकार, अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है।

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निर्णय

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान राज्य को नोटिस जारी किया, जिसमें पूछा गया है कि सात आरोपियों की बरी के खिलाफ अपील को बहाल क्यों न किया जाए।

अदालत का यह आदेश मूल रूप से उन मामलों में पीड़ितों की न्याय तक पहुंच पर नई बहस को जन्म देता है, जहाँ प्रक्रियात्मक समयसीमा अक्सर वास्तविक न्याय के रास्ते में आ जाती है।

यह मामला अब आने वाले हफ्तों में फिर से सूचीबद्ध किया जाएगा। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट की यह कार्रवाई पीड़ित परिवारों और अजमेर दरगाह समुदाय में एक नई उम्मीद जगा रही है कि शायद न्याय की राह अब फिर से खुल रही है।

Case Title: Syed Sarwar Chishty v. State of Rajasthan

Type of Petition: Special Leave Petition (SLP) under Article 136 of the Constitution

Diary No.: 51829/2025

Court: Supreme Court of India

Bench: Justice Sanjay Kumar and Justice Sandeep Mehta

Date of Order: October 3, 2025

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