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विभागीय कार्यवाही के बीच पदोन्नति नहीं: गुवाहाटी हाईकोर्ट ने पलटा एकलपीठ का आदेश

असम राज्य एवं अन्य बनाम माधव चंद्र कलिता एवं अन्य, गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कहा, बिना अनुमति B.Ed लेने वाले शिक्षक को विभागीय जांच लंबित रहने तक इन-चार्ज हेडमास्टर नहीं बनाया जा सकता।

Vivek G.
विभागीय कार्यवाही के बीच पदोन्नति नहीं: गुवाहाटी हाईकोर्ट ने पलटा एकलपीठ का आदेश

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि बिना अनुमति B.Ed डिग्री लेने पर भले ही डिग्री अमान्य न हो, लेकिन विभागीय जांच लंबित रहने पर ऐसे शिक्षक को पदोन्नति या अतिरिक्त प्रभार नहीं दिया जा सकता।

यह फैसला राज्य सरकार की अपील पर आया, जिसमें एकलपीठ के आदेश को चुनौती दी गई थी।

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मामले की पृष्ठभूमि

मामला गोतनगर हाई स्कूल में इन-चार्ज हेडमास्टर की नियुक्ति से जुड़ा है। 31 जुलाई 2024 को नियमित हेडमास्टर के सेवानिवृत्त होने के बाद यह पद खाली हुआ।

याचिकाकर्ता, जो 1990 से स्नातक शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं, वरिष्ठता सूची में प्रथम स्थान पर थे। लेकिन उन्होंने 2016 में B.Ed की डिग्री बिना नियुक्ति प्राधिकारी की पूर्व अनुमति के प्राप्त की थी।

राज्य का तर्क था कि यह आचरण नियमों का उल्लंघन है। इसी आधार पर उनकी दावेदारी को नजरअंदाज करते हुए दूसरे शिक्षक को इन-चार्ज हेडमास्टर बना दिया गया।

याचिकाकर्ता ने इस निर्णय को चुनौती दी और एकलपीठ ने उनके पक्ष में फैसला दिया था।

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राज्य सरकार की दलील

राज्य की ओर से दलील दी गई कि असम सेवा (आचरण) नियम, 1965 के तहत किसी भी सरकारी कर्मचारी को उच्च शिक्षा प्राप्त करने से पहले नियुक्ति प्राधिकारी से अनुमति लेना अनिवार्य है।

सरकार ने कहा कि संबंधित शिक्षक ने न तो पूर्व अनुमति ली और न ही विधिवत सूचना दी।

सुनवाई के दौरान राज्य के वकील ने कहा,
“विभागीय जांच लंबित है। ऐसे में यदि उन्हें हेडमास्टर का प्रभार दिया गया तो जांच प्रभावित हो सकती है।”

राज्य ने यह भी तर्क दिया कि कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) नियमों को निरस्त नहीं कर सकता।

शिक्षक की ओर से कहा गया कि 2014 और 2019 के कार्यालय ज्ञापनों के जरिए B.Ed डिग्री को मान्यता दी गई थी, विशेषकर ऑनलाइन या दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से प्राप्त डिग्री को।

उनका कहना था कि बिना अनुमति डिग्री लेना अधिकतम “कदाचार” (misconduct) हो सकता है, लेकिन इससे डिग्री स्वतः अमान्य नहीं हो जाती।

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अदालत की टिप्पणी

डिवीजन बेंच ने साफ कहा कि कार्यकारी आदेश (executive instructions) वैधानिक नियमों से ऊपर नहीं हो सकते।

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा,
“सरकार कार्यकारी निर्देश जारी कर सकती है, लेकिन वे नियमों के विपरीत नहीं हो सकते।”

अदालत ने यह भी माना कि बिना अनुमति डिग्री लेना कदाचार हो सकता है, लेकिन इससे डिग्री स्वतः रद्द नहीं होती।

हालांकि, न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण बिंदु पर जोर दिया-

“जब किसी कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्यवाही लंबित हो, तब उसे पदोन्नति या उच्च पद का प्रभार नहीं दिया जा सकता।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि इन-चार्ज हेडमास्टर का पद भले ही अस्थायी हो, लेकिन यह एक तरह की पदोन्नति ही है।

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विभागीय जांच का प्रभाव

रिकॉर्ड से यह सामने आया कि संबंधित शिक्षक के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू हो चुकी है और आरोप पत्र भी जारी किया जा चुका है। उन्होंने अपना लिखित जवाब भी दाखिल किया है।

पीठ ने कहा कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती और कर्मचारी दोषमुक्त नहीं हो जाता, तब तक उसे उच्च पद का लाभ नहीं दिया जा सकता।

अदालत का फैसला

दो सदस्यीय पीठ - न्यायमूर्ति माइकल ज़ोथनखुमा और न्यायमूर्ति कौशिक गोस्वामी - ने एकलपीठ के आदेश को अस्थिर (unsustainable) करार दिया।

अदालत ने 27 फरवरी 2025 के आदेश को निरस्त कर दिया और राज्य की रिट अपील स्वीकार कर ली।

इस तरह संबंधित शिक्षक को इन-चार्ज हेडमास्टर पद का लाभ नहीं मिलेगा, जब तक विभागीय कार्यवाही पूरी नहीं हो जाती।

Case Title: The State of Assam & Ors. vs. Madhab Chandra Kalita & Anr.

Case No.: WA/293/2025

Decision Date: 05/02/2026

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