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दादा-दादी 'फैमिली' में नहीं: मद्रास हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, स्टांप ड्यूटी में छूट नहीं मिलेगी

वी. शिवा बनाम पंजीकरण महानिरीक्षक एवं अन्य। मद्रास हाईकोर्ट ने स्टांप ड्यूटी विवाद में बड़ा फैसला सुनाया। दादा-दादी को “फैमिली” में शामिल नहीं माना, सेटलमेंट डीड पर छूट खत्म।

Vivek G.
दादा-दादी 'फैमिली' में नहीं: मद्रास हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, स्टांप ड्यूटी में छूट नहीं मिलेगी

मद्रास हाईकोर्ट की फुल बेंच ने स्टांप ड्यूटी से जुड़ा एक अहम सवाल साफ कर दिया है। अदालत ने कहा है कि भारतीय स्टांप अधिनियम की धारा 58(ए)(i) में “फैमिली” की परिभाषा में दादा-दादी शामिल नहीं हैं। इसलिए अगर कोई पोता या पोती अपनी संपत्ति दादा-दादी के नाम सेटलमेंट डीड के जरिए देती है, तो उसे कम स्टांप ड्यूटी का लाभ नहीं मिलेगा।

11 फरवरी 2026 को सुनाए गए इस फैसले ने रजिस्ट्रेशन विभाग और संपत्ति लेनदेन से जुड़े मामलों में चल रही कानूनी उलझन को खत्म कर दिया।

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मामला क्या था?

दो अलग-अलग याचिकाओं में यह विवाद उठा था। पहली याचिका में एक युवक ने अपनी संपत्ति से जुड़ा सेटलमेंट डीड रजिस्टर कराने की कोशिश की थी। दूसरी याचिका में एक पोते ने अपनी 50% हिस्सेदारी अपनी दादी के नाम करने के लिए दस्तावेज पेश किया था।

रजिस्ट्रार कार्यालय ने कम स्टांप ड्यूटी देने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि कानून में “फैमिली” की जो सूची दी गई है, उसमें दादा-दादी का नाम नहीं है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि जब “ग्रैंडचाइल्ड” यानी पोता-पोती को परिवार में शामिल किया गया है, तो दादा-दादी को भी उसी का हिस्सा माना जाना चाहिए।

लेकिन इस मुद्दे पर पहले अलग-अलग बेंचों ने अलग राय दी थी। कहीं अदालत ने कहा था कि “फैमिली” शब्द को व्यापक अर्थ में पढ़ा जाए, तो कहीं इसे सीमित दायरे में समझा गया। इसी विरोधाभास के चलते मामला बड़ी बेंच को भेजा गया।

कोर्ट में क्या बहस हुई?

याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि “फैमिली” शब्द का सामान्य अर्थ व्यापक है। कई कानूनों और फैसलों में परिवार की परिभाषा अलग-अलग तरीके से दी गई है। इसलिए इसे सख्ती से सीमित नहीं किया जाना चाहिए।

सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने दलील दी कि भारतीय स्टांप अधिनियम एक राजस्व कानून है। ऐसे कानूनों में शब्दों की व्याख्या सख्ती से की जाती है।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि “जहां परिभाषा में ‘means’ शब्द का इस्तेमाल हुआ है, वहां उसे अंतिम और सीमित माना जाता है।”

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अदालत की अहम टिप्पणी

तीन जजों की बेंच ने साफ कहा कि स्टांप एक्ट एक राजस्व वसूली कानून है। ऐसे कानून में छूट का प्रावधान सख्ती से पढ़ा जाता है।

बेंच ने कहा, “जब किसी परिभाषा में ‘means’ शब्द का प्रयोग होता है, तो वह पूर्ण और अंतिम होती है। उसमें अतिरिक्त अर्थ नहीं जोड़ा जा सकता।”

अदालत ने यह भी जोड़ा कि कानून ने जानबूझकर कुछ रिश्तों को शामिल किया है-जैसे पिता, माता, पति, पत्नी, बेटा, बेटी, पोता-पोती, भाई-बहन। लेकिन दादा-दादी का जिक्र नहीं है।

“राजस्व कानून में अदालत अपने स्तर पर विस्तार नहीं कर सकती,” बेंच ने स्पष्ट किया।

अदालत ने यह भी माना कि यदि पोते द्वारा दादा को संपत्ति दी जाए, तो कई बार इसका इस्तेमाल आगे किसी तीसरे व्यक्ति को ट्रांसफर करने के लिए किया जा सकता है। इसलिए कानून ने सीमित छूट दी है।

कानूनी विश्लेषण

फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पुराने निर्णयों का हवाला दिया गया, जिनमें कहा गया है कि स्टांप ड्यूटी दस्तावेज़ पर लगती है, लेनदेन की भावना पर नहीं।

अदालत ने यह भी कहा कि “फैमिली” की परिभाषा हर कानून में अलग हो सकती है। समाजशास्त्रीय या सामान्य अर्थ यहां लागू नहीं होंगे।

इसलिए अगर कानून ने दादा-दादी को सूची में नहीं रखा है, तो अदालत उन्हें जोड़ नहीं सकती।

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अंतिम फैसला

फुल बेंच ने स्पष्ट कर दिया कि भारतीय स्टांप अधिनियम की धारा 58(ए)(i) के तहत “फैमिली” में दादा और दादी शामिल नहीं हैं।

इसका मतलब है कि पोते-पोती द्वारा दादा-दादी के पक्ष में किए गए सेटलमेंट डीड पर कम स्टांप ड्यूटी का लाभ नहीं मिलेगा। ऐसे मामलों में सामान्य दर से स्टांप ड्यूटी देनी होगी।

मामले को अब संबंधित बेंच के पास अंतिम निपटारे के लिए भेज दिया गया है।

Case Title: V. Shiva vs Inspector General of Registration & Anr. (Connected with Achintya Bansal case)

Case No.: W.P. Nos. 24173 of 2019 & 3480 of 2021

Decision Date: 11 February 2026

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