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सिर्फ तकनीकी वजहों से नहीं छीने जा सकते संपत्ति अधिकार: दशकों पुराने भूमि विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने दी बड़ी राहत

सुप्रीम कोर्ट ने एक लंबे पारिवारिक भूमि विवाद में मकर्ध्वज राम के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि उनका दावा "कंस्ट्रक्टिव रेस जुडीकाटा" के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। - मकरध्वज राम बनाम जगदीश राय (मृत) एलआर और अन्य के माध्यम से।

CB News Desk
सिर्फ तकनीकी वजहों से नहीं छीने जा सकते संपत्ति अधिकार: दशकों पुराने भूमि विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने दी बड़ी राहत

सुप्रीम कोर्ट ने एक लंबे समय से चले आ रहे पारिवारिक भूमि विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें मकर्ध्वज राम की संपत्ति संबंधी याचिका को "कंस्ट्रक्टिव रेस जुडीकाटा" (Constructive Res Judicata) के सिद्धांत के आधार पर खारिज कर दिया गया था।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि मामले के तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने इस सिद्धांत को गलत तरीके से लागू किया था और इससे अपीलकर्ता के साथ गंभीर अन्याय होता।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद की जड़ें वर्ष 1960 तक जाती हैं। उस समय महाबीर राय ने अपनी लगभग 95.80 एकड़ भूमि का एक बड़ा हिस्सा अपनी माता राज मोहनी और अपने पुत्र मकर्ध्वज राम के नाम हस्तांतरित किया था।

इसके बाद वर्ष 1962 में एक सामान्य पावर ऑफ अटॉर्नी (GPA) के माध्यम से रिश्तेदार रामभजन को भूमि संबंधी अधिकार दिए गए। बाद में रामभजन ने 1969 में दो अलग-अलग बिक्री विलेखों के जरिए भूमि के कुछ हिस्से तीसरे पक्षों को बेच दिए।

इन बिक्री विलेखों को चुनौती देने के लिए कई मुकदमे दायर किए गए, लेकिन वे सफल नहीं हो सके। बाद में जब राजस्व अभिलेखों में नाम दर्ज कराने (म्यूटेशन) की प्रक्रिया शुरू हुई, तब मकर्ध्वज राम ने अपने स्वामित्व और कब्जे की घोषणा के लिए नया दीवानी मुकदमा दायर किया।

ट्रायल कोर्ट ने उनके पक्ष में आंशिक राहत दी थी और प्रथम अपीलीय अदालत ने भी उस फैसले को बरकरार रखा था। हालांकि, हाईकोर्ट ने बाद में यह कहते हुए मुकदमा खारिज कर दिया कि यह "कंस्ट्रक्टिव रेस जुडीकाटा" से बाधित है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि "कंस्ट्रक्टिव रेस जुडीकाटा" का उद्देश्य एक ही विवाद को बार-बार अदालतों में लाने से रोकना है, लेकिन इसका प्रयोग हर मामले में यांत्रिक तरीके से नहीं किया जा सकता।

पीठ ने कहा कि पहले के मुकदमे केवल उन बिक्री विलेखों को चुनौती देने के लिए दायर किए गए थे, जिनके जरिए भूमि के कुछ हिस्सों का हस्तांतरण हुआ था। वर्तमान मुकदमा उससे अलग था क्योंकि इसमें उस भूमि पर स्वामित्व और कब्जे की घोषणा मांगी गई थी, जो उन बिक्री विलेखों से प्रभावित नहीं हुई थी।

फैसले में अदालत ने कहा:

“जब 1960 के दस्तावेज़ के आधार पर बड़ी भूमि पर उसका अधिकार पहले से ही स्थापित था, तब उस अधिकार को दोबारा घोषित करने की आवश्यकता कहां थी?”

अदालत ने माना कि अपीलकर्ता को अपने व्यापक स्वामित्व अधिकार का दावा तब उठाना पड़ा, जब राजस्व रिकॉर्ड में उससे अधिक भूमि पर दावा करने का प्रयास किया गया, जो वास्तविक बिक्री का हिस्सा नहीं थी।

पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट इस महत्वपूर्ण तथ्य पर ध्यान नहीं दे सका कि अपीलकर्ता पहले से अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक कानूनी कदम उठा रहा था।

न्यायालय ने कहा कि यदि हाईकोर्ट का दृष्टिकोण स्वीकार कर लिया जाए, तो इसका परिणाम यह होगा कि अपीलकर्ता उस पूरी संपत्ति से वंचित हो जाएगा, जो उसके नाम दशकों से दर्ज थी।

फैसले में कहा गया कि पारिवारिक संपत्ति विवादों में कानून को केवल तकनीकी रूप से नहीं, बल्कि न्याय और वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर लागू किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 18 सितंबर 2009 के फैसले को रद्द करते हुए मकर्ध्वज राम की अपील स्वीकार कर ली।

अदालत ने स्पष्ट किया कि पक्षकार कानून के अनुसार उपलब्ध अन्य उपायों का सहारा लेने के लिए स्वतंत्र होंगे। साथ ही, न्यायालय ने निर्देश दिया कि दोनों पक्ष अपने-अपने मुकदमे का खर्च स्वयं वहन करेंगे।

Case Details

Case Title: Makardhwaj Ram v. Jagdish Rai (Dead) Through LRs & Anr.

Case Number: Civil Appeal No. 2950 of 2011

Judges: Justice Sanjay Karol and Justice N. Kotiswar Singh

Decision Date: June 11, 2026

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