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पगड़ी पेमेंट से किराएदारी का स्थायी अधिकार नहीं मिलता: दिल्ली हाई कोर्ट ने बेदखली के आदेश को बरकरार रखा

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि पगड़ी की रकम लेने से मकान-मालिक और किरायेदार का संबंध समाप्त नहीं होता और इससे स्थायी किरायेदारी का अधिकार भी पैदा नहीं होता। - श्री श्याम लाल एंड संस बनाम श्रीमती मिथलेश देवी

Shivam Y.
पगड़ी पेमेंट से किराएदारी का स्थायी अधिकार नहीं मिलता: दिल्ली हाई कोर्ट ने बेदखली के आदेश को बरकरार रखा

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक किरायेदार फर्म द्वारा दायर दूसरी अपील खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि दुकान किराए पर देते समय पगड़ी (Pagri) के रूप में बड़ी रकम लेने मात्र से किरायेदारी स्थायी नहीं हो जाती। अदालत ने कहा कि इससे पक्षों के बीच मौजूद मकान-मालिक और किरायेदार के संबंध की कानूनी प्रकृति नहीं बदलती।

न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने यह फैसला सुनाते हुए निचली अदालतों द्वारा पारित बेदखली डिक्री को बरकरार रखा।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला नई दिल्ली के नवादा स्थित गुलाब बाग की एक दुकान से जुड़ा था। संपत्ति की मालिक मिथलेश देवी ने वर्ष 2001 में यह दुकान MS श्याम लाल एंड संस को किराए पर दी थी। दुकान में जूते का कारोबार संचालित किया जा रहा था।

बाद में मकान-मालकिन ने दुकान अपने परिवार की जरूरतों के लिए खाली कराने की मांग की। इसके खिलाफ किरायेदार ने तर्क दिया कि उसने किरायेदारी शुरू होने के समय पगड़ी के रूप में बड़ी रकम अदा की थी, इसलिए किरायेदारी समाप्त नहीं की जा सकती।

किरायेदार ने एक एमओयू (MoU) का भी हवाला दिया, जिसमें कथित तौर पर उसके अधिकारों का उल्लेख था।

हाईकोर्ट ने किराया समझौते और रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य दस्तावेजों का परीक्षण किया। अदालत ने माना कि यदि यह मान भी लिया जाए कि किरायेदार ने 1.48 लाख रुपये पगड़ी के रूप में दिए थे, तब भी इससे दोनों पक्षों के बीच का संबंध नहीं बदलता।

अदालत ने कहा, “यदि इन दस्तावेजों और किराया समझौते में किए गए उल्लेखों को स्वीकार भी कर लिया जाए, तब भी इससे पक्षों के बीच मौजूद मकान-मालिक और किरायेदार के संबंध की प्रकृति नहीं बदलती।”

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि किराया समझौते में स्वयं किरायेदार को नोटिस देकर किरायेदारी समाप्त करने का अधिकार दिया गया था। इससे यह दावा कमजोर पड़ जाता है कि किरायेदारी स्थायी या कभी समाप्त न होने वाली थी।

दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम (Delhi Rent Control Act) की सुरक्षा का दावा भी अदालत ने स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि जिस क्षेत्र में विवादित दुकान स्थित है, वहां इस अधिनियम को लागू करने संबंधी आवश्यक अधिसूचना जारी नहीं की गई थी। इसलिए किरायेदार इस कानून का लाभ नहीं ले सकता।

किरायेदार की ओर से यह भी कहा गया था कि बेदखली से पहले कोई नोटिस नहीं दिया गया। इस पर अदालत ने स्थापित कानूनी सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि बेदखली का मुकदमा दायर किया जाना ही परिसर खाली करने के नोटिस के समान माना जाता है।

सभी तथ्यों और रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत ने सही निष्कर्ष निकाला था कि पक्षों के बीच मकान-मालिक और किरायेदार का संबंध मौजूद था तथा विवादित संपत्ति पर दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम लागू नहीं होता।

अदालत ने यह भी माना कि मुकदमा दायर किया जाना ही परिसर खाली करने के लिए पर्याप्त नोटिस था।

इन परिस्थितियों में न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने नियमित द्वितीय अपील (RSA 136/2018) और उससे संबंधित लंबित आवेदनों को खारिज कर दिया तथा मकान-मालकिन के पक्ष में पारित बेदखली डिक्री को बरकरार रखा।

Case Details:

Case Title: M/s Shyam Lal & Sons v. Smt. Mithlesh Devi

Case Number: RSA 136/2018

Judge: Justice Neena Bansal Krishna

Decision Date: 16 June 2026

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