सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सबरीमाला संदर्भ मामले की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म की मूल संरचना को कमजोर नहीं किया जा सकता।
यह मामला 2018 के सबरीमाला फैसले से जुड़ा है, जिसमें सभी आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी। इस फैसले के बाद कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर हुईं।
2019 में शीर्ष अदालत ने व्यापक संवैधानिक सवालों जैसे समानता और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन को नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ को सौंप दिया।
इस पीठ की अध्यक्षता भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत कर रहे हैं और इसमें न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, एम.एम. सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जॉयमाल्य बागची शामिल हैं।
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मुख्य न्यायाधीश सूर्यकान्त ने कहा,
“किसी अदालत के लिए यह कहना सबसे कठिन होता है कि करोड़ों लोगों की आस्था गलत है।”
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने स्पष्ट रूप से कहा,
“सामाजिक कल्याण और सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता।”
न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश ने यह भी सवाल उठाया कि क्या अदालतें बिना व्यापक प्रतिनिधित्व के ऐसे मुद्दों पर निर्णय ले सकती हैं।
त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने तर्क दिया कि संविधान के अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत सामाजिक सुधार की शक्ति को इस तरह नहीं पढ़ा जाना चाहिए कि वह अनुच्छेद 25(1) में दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के मूल अधिकार को कमजोर कर दे।
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उन्होंने कहा,
“सामाजिक सुधार की व्याख्या इस तरह नहीं होनी चाहिए कि धर्म के मूल अधिकार का क्षरण हो जाए।”
सिंघवी ने यह भी कहा कि अदालतों को यह तय करने से बचना चाहिए कि कौन-सी धार्मिक प्रथाएं ‘आवश्यक’ हैं, क्योंकि इससे न्यायिक हस्तक्षेप बढ़ सकता है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मंदिर में प्रवेश का अधिकार सभी को मिल सकता है, लेकिन पूजा की आंतरिक विधियों को नियंत्रित करने का अधिकार संबंधित धार्मिक संप्रदाय के पास रहना चाहिए।
आज ने कोई अंतिम आदेश पारित नहीं किया। सुनवाई जारी रही और अगले दिन बहस जारी रहने का कार्यक्रम है।










