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सर्वोच्च न्यायालय ने मध्यस्थता कानून को स्पष्ट किया: अनुबंध खंड में 'सकते हैं' शब्द पक्षों को मध्यस्थता के लिए बाध्य नहीं करता है

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कॉन्ट्रैक्ट में ‘can’ शब्द केवल संभावना दिखाता है, बाध्यता नहीं। ऐसे क्लॉज से अनिवार्य arbitration नहीं माना जा सकता। - नागरीका इंडकॉन प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम कार्गोकेयर लॉजिस्टिक्स (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड।

Vivek G.
सर्वोच्च न्यायालय ने मध्यस्थता कानून को स्पष्ट किया: अनुबंध खंड में 'सकते हैं' शब्द पक्षों को मध्यस्थता के लिए बाध्य नहीं करता है

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यदि किसी अनुबंध (contract) की विवाद निपटान शर्त में “can” शब्द इस्तेमाल किया गया है, तो उसे अनिवार्य arbitration agreement नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि “can” केवल विकल्प या संभावना दर्शाता है, बाध्यता नहीं।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता कंपनी एल्युमिनियम फॉयल कंटेनर और किचन रोल बनाती है। कंपनी ने अपने माल की विदेश भेजाई के लिए प्रतिवादी लॉजिस्टिक्स कंपनी से अनुबंध किया था। कुल छह कंटेनरों में से चार सफलतापूर्वक भेजे गए, लेकिन पांचवें कंटेनर को लेकर विवाद खड़ा हुआ।

अपीलकर्ता का कहना था कि सामान बिना मूल बिल ऑफ लेडिंग प्रस्तुत किए सौंप दिया गया, जिससे उसे आर्थिक नुकसान हुआ। इसके बाद कंपनी ने arbitration शुरू करने का नोटिस भेजा।

“मतभेद या उससे संबंधित किसी भी विवाद का निपटारा मध्यस्थता द्वारा किया जा सकता है…”

यहीं से मुख्य कानूनी सवाल उठा कि क्या “can be settled” का मतलब अनिवार्य arbitration है या केवल विकल्प।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने पहले ही arbitration application खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने माना था कि clause में “can” शब्द इस्तेमाल हुआ है, इसलिए arbitration को अनिवार्य नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने कहा कि arbitration पूरी तरह पक्षकारों की सहमति पर आधारित प्रक्रिया है।

पीठ ने कहा,

"मध्यस्थता को तभी विधि के रूप में चुना जा सकता है जब दोनों पक्ष सहमत हों।"

अदालत ने शब्द “can” के सामान्य अर्थ पर भी चर्चा की और कहा कि यह क्षमता, संभावना या विकल्प दिखाता है, न कि बाध्यता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि पक्षकारों को अनिवार्य arbitration चाहिए होता, तो वे “shall” जैसे स्पष्ट शब्द का उपयोग कर सकते थे।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि संबंधित clause केवल भविष्य में arbitration की संभावना दर्शाता है, यह बाध्यकारी arbitration agreement नहीं है। ऐसे में arbitration शुरू करने के लिए दोनों पक्षों की आगे की सहमति आवश्यक होती।

इसी आधार पर अदालत ने कंपनी की अपील खारिज कर दी और बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश बरकरार रखा।

Case Details

Case Title: Nagreeeka Indcon Products Pvt. Ltd. v. Cargocare Logistics (India) Pvt. Ltd.

Case Number: Civil Appeal arising out of SLP (Civil) No. 19026 of 2023

Judge: Justice Sanjay Karol and Justice Nongmeikapam Kotiswar Singh

Decision Date: 17 April 2026

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