मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार की विवाह सहायता योजना से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सिंगल जज के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि न्यायालय किसी सरकारी नीति का दायरा बढ़ाकर उसे नई श्रेणी के लोगों तक लागू नहीं कर सकता। यह कार्य कार्यपालिका का है, न कि न्यायपालिका का।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस मनिंद्र मोहन श्रीवास्तव और जस्टिस जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने यह फैसला राज्य सरकार की अपील पर सुनाया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मूवलूर रामामिर्थम अम्मैयार विवाह सहायता योजना से जुड़ा था, जिसे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की बेटियों के विवाह में सहायता देने के लिए शुरू किया गया था। योजना के अनुसार लाभ पाने के लिए आवेदक परिवार की मासिक आय 6,000 रुपये (यानी 72,000 रुपये वार्षिक) से अधिक नहीं होनी चाहिए।
मामले में याचिकाकर्ता एस. चित्रा ने योजना का लाभ मांगा था। लेकिन संबंधित ज़ोनल डिप्टी तहसीलदार द्वारा जारी आय प्रमाणपत्र में उनकी वार्षिक आय 1,08,000 रुपये यानी लगभग 9,000 रुपये प्रति माह दर्ज थी। इसी आधार पर प्रशासन ने उनका आवेदन खारिज कर दिया।
इसके बाद चित्रा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
मामले की सुनवाई करते हुए सिंगल जज ने यह टिप्पणी की थी कि योजना का लाभ उन लोगों तक भी बढ़ाया जाना चाहिए जो न्यूनतम मजदूरी के बराबर या उससे कम कमाते हैं।
अदालत ने इस आधार पर योजना के दायरे को व्यापक बनाने का निर्देश दिया था, जिससे अधिक लोगों को लाभ मिल सके।
राज्य सरकार ने इस आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि सिंगल जज ने याचिका के दायरे से बाहर जाकर फैसला दिया है।
खंडपीठ ने भी इस दलील से सहमति जताई। अदालत ने कहा कि याचिका में केवल यह सवाल था कि चित्रा का आवेदन सही तरीके से खारिज किया गया या नहीं।
पीठ ने कहा,
“योजना के दायरे को बढ़ाकर एक बड़ी श्रेणी तक लाभ देना कार्यपालिका का निर्णय होता है। न्यायालय अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए सरकारी नीति को बदल या प्रतिस्थापित नहीं कर सकता।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक समीक्षा की सीमाएँ होती हैं और अदालत केवल तभी हस्तक्षेप कर सकती है जब नीति कानून या संविधान का उल्लंघन करती हो।
खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता को योजना का लाभ तभी मिल सकता था जब वह यह साबित करती कि उसकी मासिक आय 6,000 रुपये या उससे कम है।
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लेकिन रिकॉर्ड पर मौजूद आय प्रमाणपत्र में उनकी आय 9,000 रुपये प्रतिमाह बताई गई थी। अदालत ने कहा कि इस प्रमाणपत्र को चुनौती देने के लिए कोई ठोस सामग्री प्रस्तुत नहीं की गई।
अंत में मद्रास हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील स्वीकार करते हुए सिंगल जज का आदेश रद्द कर दिया।
हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि यदि याचिकाकर्ता ज़ोनल डिप्टी तहसीलदार से नए सिरे से जांच करवाकर आय प्रमाणपत्र संशोधित करा लेती है और यह साबित हो जाता है कि उस समय उसकी आय 6,000 रुपये से कम थी, तो वह योजना के लाभ की हकदार हो सकती है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह निर्देश केवल इसी मामले तक सीमित रहेगा और इसे सामान्य आदेश नहीं माना जाएगा।
Case Title: The Principal Secretary to Government & Another vs S. Chitra & Another
Case Number: Writ Appeal (WA) No. 3866 of 2025
Date of Judgment: 19 February 2026










