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जब वाणिज्यिक न्यायालय का आदेश मध्यस्थता अधिनियम की धारा 9 के तहत राहत न दे और न ही अस्वीकार करे, तब रिट याचिका विचारणीय: केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने कहा कि जब वाणिज्यिक न्यायालय का आदेश धारा 9 के तहत न तो राहत प्रदान करता है और न ही उसे अस्वीकार करता है, तब वह धारा 37 के तहत अपील योग्य नहीं होता और रिट याचिका विचारणीय रहती है।

Vivek G.
जब वाणिज्यिक न्यायालय का आदेश मध्यस्थता अधिनियम की धारा 9 के तहत राहत न दे और न ही अस्वीकार करे, तब रिट याचिका विचारणीय: केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन की पीठ ने हाल ही में यह माना कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226/227 के तहत रिट याचिका उस स्थिति में विचारणीय है जब वाणिज्यिक न्यायालय द्वारा मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 9 के तहत दिया गया आदेश न तो राहत देता है और न ही उसे अस्वीकार करता है, जिससे वह आदेश धारा 37 के तहत अपील योग्य नहीं बनता।

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इस मामले में फ्लेमिंगो (डीएफएस) प्राइवेट लिमिटेड (याचिकाकर्ता) ने एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (प्रतिवादी) द्वारा बैंक गारंटी के इनकैशमेंट को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का रुख किया। याचिकाकर्ता ने इसे अवैध बताते हुए गारंटी बहाल करने या वैकल्पिक रूप से उस राशि को ब्याज सहित सावधि जमा खाते में जमा करने का निर्देश देने की मांग की, जब तक मध्यस्थता प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि कोर्ट के अंतरिम आदेशों और लंबित विवाद की जानकारी के बावजूद प्रतिवादी ने अनुचित कार्यवाही की। साथ ही यह भी कहा गया कि 21.06.2024 को एक नया एकल मध्यस्थ नियुक्त किया गया है और इस दौरान गारंटी इनकैश करने से उन्हें गंभीर नुकसान हुआ।

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प्रतिवादी ने याचिका की वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा कि मध्यस्थता अधिनियम में वैकल्पिक उपाय मौजूद होने के कारण रिट याचिका विचारणीय नहीं है।

हाईकोर्ट ने कहा:

“मध्यस्थता अधिनियम की धारा 37 के तहत अपील केवल तब की जा सकती है जब धारा 9 के तहत कोई आदेश राहत दे या अस्वीकार करे। यहां वाणिज्यिक न्यायालय ने केवल यह कहते हुए याचिका बंद की कि मध्यस्थता की कार्यवाही शुरू हो चुकी है। अतः यह आदेश राहत अस्वीकार करने जैसा नहीं है।”

कोर्ट ने यह भी पाया कि वाणिज्यिक न्यायालय ने गलत धारणा के तहत याचिकाकर्ता को धारा 17 के तहत मध्यस्थ से राहत लेने का निर्देश दिया, यह मानते हुए कि मध्यस्थ ने कार्य शुरू कर दिया है। चूंकि आदेश ने स्पष्ट रूप से राहत न तो दी और न ही अस्वीकार की, इसलिए वह धारा 37 के तहत अपील योग्य नहीं है और रिट याचिका विचारणीय है।

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सुप्रीम कोर्ट के Asian Resurfacing of Road Agency Pvt. Ltd. बनाम CBI (2018) मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“अगर कोई अंतरिम स्थगन आदेश विधिक रूप से और पक्षों को सुनकर पारित किया गया है, तो केवल समय बीतने के कारण उसे समाप्त नहीं माना जा सकता, जब तक याचिकाकर्ता की ओर से कोई लापरवाही न हो।”

कोर्ट ने पाया कि नया मध्यस्थ नियुक्त किया गया है और उसकी वैधता पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई लंबित है, इस कारण याचिकाकर्ता का तर्क सही ठहराया जा सकता है।

अंततः कोर्ट ने निर्देश दिया:

“उपरोक्त तथ्यों और सुप्रीम कोर्ट के स्थगन आदेश को देखते हुए, प्रतिवादी को निर्देश दिया जाता है कि वे दोनों बैंक गारंटी से प्राप्त राशि को ब्याज सहित सावधि जमा खाते में सुरक्षित रखें।”

तदनुसार, वर्तमान याचिका का निपटारा किया गया।

केस शीर्षक: फ्लेमिंगो (डीएफएस) प्राइवेट लिमिटेड बनाम भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण

केस संख्या: डब्ल्यूपी(सी) संख्या 24021 वर्ष 2023

निर्णय तिथि: 11/04/2025

याचिकाकर्ता के लिए: जी.हरिकुमार (गोपीनाथन नायर) अखिल सुरेश संतोष मैथ्यू

प्रतिवादी के लिए: अधिवक्ता वी.संथाराम द्वारा

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