गुजरात हाईकोर्ट ने एक कथित कस्टोडियल डेथ (हिरासत में मौत) मामले में FIR दर्ज कराने और स्वतंत्र जांच कराने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में सीधे हाईकोर्ट आने से पहले याचिकाकर्ता को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के तहत उपलब्ध वैकल्पिक उपायों का इस्तेमाल करना चाहिए।
न्यायमूर्ति डी.एन. रे ने यह फैसला तोफिक शेख द्वारा दायर याचिका पर सुनाया, जिसमें उनके पिता जाहिरुद्दीन ग्यासुद्दीन शेख की हिरासत में कथित मौत की जांच की मांग की गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिका के अनुसार, जाहिरुद्दीन ग्यासुद्दीन शेख को 18 मई 2026 को अहमदाबाद के वेजलपुर पुलिस स्टेशन में दर्ज एक आपराधिक मामले में गिरफ्तार किया गया था। परिवार का आरोप था कि हिरासत के दौरान उनके साथ मारपीट की गई और उन्हें कुछ अज्ञात पदार्थ दिए गए।
बाद में उनकी तबीयत बिगड़ने पर उन्हें विभिन्न अस्पतालों में ले जाया गया। अंततः 19 मई 2026 को एसवीपी अस्पताल में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। इसके बाद पुलिस ने आकस्मिक मृत्यु (Accidental Death) का मामला दर्ज किया।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि मेडिकल रिकॉर्ड और घटनाक्रम प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध की ओर संकेत करते हैं। इसलिए पुलिस को तत्काल FIR दर्ज करनी चाहिए थी।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जब किसी शिकायत से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तब FIR दर्ज करना अनिवार्य होता है। इसके बावजूद पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कोई FIR दर्ज नहीं की गई।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कस्टोडियल डेथ की गंभीरता को स्वीकार किया। अदालत ने कहा कि हिरासत में मौत अत्यंत गंभीर मामला है क्योंकि ऐसी स्थिति में व्यक्ति राज्य की सुरक्षा और संरक्षण में होता है।
न्यायालय ने टिप्पणी की,
“कस्टोडियल डेथ निस्संदेह एक जघन्य अपराध है।” अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे आरोप उन अधिकारियों के खिलाफ होते हैं जिन पर नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी होती है।हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि FIR दर्ज नहीं होने की स्थिति में कानून ने एक निर्धारित प्रक्रिया प्रदान की है। BNSS के तहत पहले वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और उसके बाद क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष जाने का उपाय उपलब्ध है।
हाईकोर्ट ने साकिरी वासु, एम. सुब्रमण्यम, सुधीर भास्करराव तांबे और हाल ही में दिए गए सुजल विश्वास अट्टावर बनाम महाराष्ट्र राज्य फैसलों का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि FIR दर्ज न होने की शिकायत पर सीधे रिट याचिका दायर करना सामान्य नियम नहीं है, जब तक कि वैधानिक उपाय उपलब्ध हों।
अंत में गुजरात हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि केवल इसलिए कि मामला कथित कस्टोडियल डेथ से जुड़ा है, वैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने याचिकाकर्ता को BNSS के तहत उपलब्ध अन्य कानूनी उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी। साथ ही स्पष्ट किया कि इस आदेश को मामले के तथ्यों या किसी संभावित अपराध के संबंध में अदालत की राय नहीं माना जाएगा।
Case Details:
Case Title: Tofik Shaikh S/o Jahiruddin Gyasuddin Shaikh v. State of Gujarat & Ors.
Case Number: R/Special Criminal Application No. 7352 of 2026
Judge: Justice D.N. Ray
Decision Date: 29 May 2026

