सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में राजस्थान और गुजरात में कार्यरत दो सरकारी डॉक्टरों के बीच चले लंबे वैवाहिक विवाद का अंत करते हुए विवाह विच्छेद (तलाक) को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि बिना उचित कारण लंबे समय तक वैवाहिक संबंधों से दूरी बनाए रखना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आ सकता है। साथ ही, 15 वर्षों से अधिक समय तक अलग रहना और सुलह की सभी संभावनाओं का समाप्त हो जाना यह दर्शाता है कि विवाह अब व्यवहारिक रूप से समाप्त हो चुका है।
मामले की पृष्ठभूमि
सोनल तलपड़ा और वीरभान सिंह का विवाह 5 दिसंबर 2007 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। दोनों पेशे से डॉक्टर हैं और सरकारी सेवा में कार्यरत हैं। विवाह के बाद दोनों के बीच मतभेद उत्पन्न हुए और वे बहुत कम समय तक साथ रह सके। दंपति की कोई संतान भी नहीं है।
पति ने वर्ष 2009 में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता के आधार पर तलाक की याचिका दायर की थी। हालांकि, भरतपुर स्थित फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि क्रूरता के आरोप साबित नहीं हुए हैं। बाद में राजस्थान हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला पलटते हुए पति को तलाक दे दिया। इसी आदेश को पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
पत्नी की ओर से कहा गया कि उसने कभी विवाह नहीं छोड़ा और वह हमेशा वैवाहिक जीवन जारी रखने के लिए तैयार थी। उसका कहना था कि पति ने ही उसे अपने वैवाहिक दायित्व निभाने का अवसर नहीं दिया। यह भी तर्क दिया गया कि तलाक याचिका में परित्याग (Desertion) या विवाह के अपूरणीय रूप से टूट जाने (Irretrievable Breakdown of Marriage) का आधार नहीं लिया गया था।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए पाया कि पति-पत्नी लगभग 15 वर्षों से अलग रह रहे हैं। अदालत द्वारा भेजे गए मध्यस्थता (मेडिएशन) प्रयास भी असफल रहे।
पीठ ने कहा कि साक्ष्यों से यह भी सामने आया कि साथ रहने के दौरान पत्नी अलग कमरे में सोती थी और पति को दूसरे कमरे में रात बितानी पड़ती थी। अदालत ने माना कि इस तथ्य का पत्नी ने प्रभावी रूप से खंडन नहीं किया।
फैसले में कहा गया, “भारतीय न्यायालय लगातार यह मानते रहे हैं कि बिना उचित कारण लंबे समय तक यौन संबंधों से इनकार करना मानसिक पीड़ा पहुंचाता है और वैवाहिक संबंधों की मूल भावना को प्रभावित करता है।”
न्यायालय ने कहा कि विवाह को केवल कानूनी अधिकारों के दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता। यह पारस्परिक सम्मान, भावनात्मक सहयोग, जिम्मेदारी और साथ निभाने का संबंध है।
पीठ ने कहा कि वैवाहिक अधिकार और वैवाहिक कर्तव्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यदि कोई पक्ष लंबे समय तक विवाह के मूल दायित्वों से दूरी बनाए रखता है, तो यह मानसिक क्रूरता के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण कारक हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब पति-पत्नी कई वर्षों तक अलग रहते हैं और पुनर्मिलन की कोई वास्तविक संभावना नहीं बचती, तो ऐसे संबंध को जबरन बनाए रखना दोनों पक्षों के लिए मानसिक कष्ट का कारण बन सकता है।
अदालत ने कहा कि इतने लंबे समय बाद पक्षकारों को फिर से साथ रहने के लिए बाध्य करना स्वयं उनके प्रति क्रूरता जैसा होगा।
पीठ ने पाया कि दोनों पक्षों ने अलग-अलग जीवन बना लिए हैं और 15 वर्षों से अधिक समय तक चले अलगाव के दौरान कोई सार्थक प्रयास पुनर्मिलन के लिए नहीं किया गया। मध्यस्थता की प्रक्रिया भी विफल रही।
अदालत ने माना कि विवाह व्यवहारिक और भावनात्मक दोनों स्तरों पर समाप्त हो चुका है तथा उसके पुनर्जीवित होने की कोई संभावना नहीं है।
पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए विवाह को समाप्त करने के हाईकोर्ट के निर्णय को सही ठहराया।
अदालत ने पत्नी की अपील खारिज कर दी और दोनों पक्षों के बीच विवाह विच्छेद को बरकरार रखा। साथ ही, मामले में किसी भी पक्ष पर लागत (कॉस्ट) नहीं लगाई गई।
Case Details:
Case Title: Sonal Talpada v. Veerbhan Singh
Case Number: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 10422 of 2025
Judges: Justice Sanjay Karol and Justice Augustine George Masih
Decision Date: June 2, 2026

