सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की व्याख्या करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायालय ने कहा कि यदि कोई लोक सेवक स्वयं रिश्वत नहीं लेता, लेकिन अपने अधीनस्थों (Subordinates) या किसी तीसरे व्यक्ति के माध्यम से अवैध लाभ हासिल करने का प्रयास करता है, तब भी उसके खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला बन सकता है।
इसी सिद्धांत के आधार पर अदालत ने कर्नाटक के एक पुलिस उपनिरीक्षक (PSI) के खिलाफ दर्ज FIR को बहाल कर दिया, जिसे पहले कर्नाटक हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला बेल्लारी जिले में तैनात पुलिस उपनिरीक्षक के. रंगैया से जुड़ा है। शिकायतकर्ता का आरोप था कि मार्च 2023 में पुलिस ने राशन चावल के कथित अवैध परिवहन के संदेह में उसका मोबाइल फोन और दोपहिया वाहन जब्त कर लिया था।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि जब उसने कई बार पुलिस स्टेशन जाकर अपनी जब्त संपत्ति लौटाने की मांग की, तो उसे पैसे देने के संकेत दिए गए। शिकायत के अनुसार, पहले एक निजी व्यक्ति ने कथित रूप से ₹50,000 की मांग की और बाद में एक पुलिस कांस्टेबल ने ₹5,000 रिश्वत मांगी, जिसे बातचीत के बाद ₹3,000 तक कम कर दिया गया।
इसके बाद शिकायतकर्ता ने लोकायुक्त पुलिस के समक्ष शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7(a) के तहत FIR दर्ज की गई।
जनवरी 2024 में कर्नाटक हाईकोर्ट ने पुलिस उपनिरीक्षक के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट का मानना था कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई स्पष्ट आरोप नहीं था जिससे यह साबित हो कि अधिकारी ने स्वयं रिश्वत मांगी या स्वीकार की थी।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिस्वर सिंह की पीठ ने हाईकोर्ट के दृष्टिकोण से असहमति जताई।
पीठ ने कहा कि FIR रद्द करने की शक्ति असाधारण है और इसका प्रयोग बहुत सीमित परिस्थितियों में किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि FIR की वैधता पर विचार करते समय अदालत को केवल यह देखना होता है कि प्रथम दृष्टया कोई अपराध बनता है या नहीं।
पीठ ने कहा,
“हाईकोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र की सीमाओं से आगे बढ़कर साक्ष्यों का मूल्यांकन किया और वस्तुतः एक ‘मिनी ट्रायल’ कर डाला, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं है।”सुप्रीम कोर्ट ने धारा 7(a) और उसकी व्याख्यात्मक टिप्पणियों का विस्तृत विश्लेषण किया। अदालत ने कहा कि कानून केवल प्रत्यक्ष रिश्वत लेने वालों तक सीमित नहीं है।
पीठ के अनुसार, यदि कोई लोक सेवक अपने प्रभाव का उपयोग करके किसी अन्य व्यक्ति या अधीनस्थ के लिए अनुचित लाभ प्राप्त करने का प्रयास करता है, तो वह भी कानून के दायरे में आएगा।
अदालत ने शिकायत में दर्ज उस कथन का उल्लेख किया जिसमें अधिकारी ने कथित रूप से शिकायतकर्ता से कहा था कि वह “उन लड़कों के लिए कुछ कर दे।” न्यायालय ने माना कि इस कथन को प्रारंभिक स्तर पर पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, विशेषकर तब जब इसके तुरंत बाद अधीनस्थ कर्मचारी द्वारा धन की मांग किए जाने का आरोप हो।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की अपील स्वीकार करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट के 23 जनवरी 2024 के आदेश को रद्द कर दिया।
अदालत ने कहा कि शिकायत और FIR में दर्ज आरोप प्रथम दृष्टया भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7(a) के तहत अपराध का संकेत देते हैं। इसलिए FIR और उससे संबंधित सभी कार्यवाहियां पुनः प्रभावी रहेंगी तथा ट्रायल कोर्ट कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करेगा।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके ये निष्कर्ष केवल FIR रद्द करने के प्रश्न तक सीमित हैं और मुकदमे के दौरान आरोपी की दोषसिद्धि या निर्दोषता का निर्णय उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ट्रायल कोर्ट स्वतंत्र रूप से करेगा।
Case Details:
Case Title: The State by Lokayuktha Police v. Sri K. Rangayya & Anr.
Case Number: Criminal Appeal arising out of SLP (Criminal) No. 5245 of 2025
Judges: Justice Sanjay Karol and Justice Nongmeikapam Kotiswar Singh
Decision Date: 26 May 2026

