सुप्रीम कोर्ट ने चेक अनादरण (चेक बाउंस) के एक मामले में कंपनी और उसके निदेशक के खिलाफ दर्ज दोषसिद्धि को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि पक्षकारों के बीच पूर्ण और अंतिम समझौता हो चुका है, इसलिए अपराध को कम्पाउंड (समझौते के आधार पर समाप्त) किया जा सकता है। साथ ही, कोर्ट ने जेल में बंद निदेशक की तत्काल रिहाई का भी आदेश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला परशरवनाथ वेल्ड वायर्स प्राइवेट लिमिटेड और उसके निदेशक के खिलाफ दायर शिकायत से जुड़ा था। शिकायतकर्ता ने परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act) की धारा 138 के तहत कार्रवाई शुरू की थी।
ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2014 में आरोपियों को दोषी ठहराते हुए निदेशक को एक वर्ष के साधारण कारावास की सजा सुनाई थी। इसके अलावा ₹28 लाख की राशि शिकायतकर्ता को मुआवजे के रूप में देने का आदेश दिया गया था।
बाद में अपीलीय अदालत और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी इस दोषसिद्धि को बरकरार रखा। हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद निदेशक को 23 अप्रैल 2026 को जेल भेज दिया गया।
निदेशक के जेल जाने के दो दिन बाद, 25 अप्रैल 2026 को दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ। समझौते के तहत आरोपियों ने शिकायतकर्ता को ₹30 लाख का भुगतान किया, जिसे शिकायतकर्ता ने पूर्ण और अंतिम निपटान के रूप में स्वीकार कर लिया।
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने कहा कि शिकायतकर्ता की शिकायत का पूरी तरह समाधान हो चुका है।
पीठ ने कहा,
“हम पक्षकारों के बीच हुए समझौते को स्वीकार करने और अपराध को कम्पाउंड करने में कोई हिचकिचाहट नहीं देखते, विशेष रूप से तब जब विवाद आपसी सहमति से सुलझ चुका है।”सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। इसके साथ ही कंपनी और उसके निदेशक के खिलाफ दर्ज दोषसिद्धि तथा सजा को भी निरस्त कर दिया गया।
चूंकि निदेशक पहले से जेल में था, अदालत ने केंद्रीय जेल, रायपुर के अधीक्षक को उसे तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया और आदेश के अनुपालन की सूचना कोर्ट रजिस्ट्री को भेजने को कहा।

