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बैंक खातों को पूरी तरह फ्रीज़ करना अवैध, केवल संदिग्ध राशि ही रोकी जा सकती है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया है कि साइबर अपराध के मामलों में बैंक पूरे खाते फ्रीज नहीं कर सकते; केवल संदिग्ध राशि को ही ब्लॉक किया जा सकता है, जिससे खाताधारकों को राहत मिलेगी। - आशीष रावत बनाम भारत संघ और अन्य

Shivam Y.
बैंक खातों को पूरी तरह फ्रीज़ करना अवैध, केवल संदिग्ध राशि ही रोकी जा सकती है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि साइबर अपराध जांच के नाम पर पूरे बैंक खाते को फ्रीज़ करना कानून के दायरे से बाहर है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल वही राशि रोकी जा सकती है जो संदिग्ध हो, न कि पूरा खाता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला कई याचिकाओं के समूह से जुड़ा था, जिनमें याचिकाकर्ताओं ने शिकायत की कि उनके बैंक खाते साइबर अपराध जांच के चलते अचानक फ्रीज़ कर दिए गए।

अधिकांश मामलों में:

  • खाताधारकों को कोई पूर्व सूचना नहीं दी गई
  • न ही कारण स्पष्ट किए गए
  • कई खातों में छोटी रकम के आधार पर पूरा खाता बंद कर दिया गया

याचिकाकर्ताओं ने अदालत से खाते डी-फ्रीज़ करने की मांग की।

याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि:

एक वकील ने तर्क दिया,

“पूरे खाते को फ्रीज़ करना कानून के उद्देश्य से परे है, केवल संदिग्ध रकम पर ही रोक लगाई जा सकती है।”

सरकार की ओर से कहा गया कि:

  • साइबर अपराध रोकने के लिए त्वरित कार्रवाई जरूरी है
  • BNSS की धारा 106 पुलिस को खाते फ्रीज़ करने की अनुमति देती है
  • पहले सूचना देना जरूरी नहीं है

दो-न्यायाधीशों की पीठ न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी ने विस्तार से कानून की व्याख्या की।

अदालत ने कहा:

“धारा 106 BNSS के तहत ‘property’ का अर्थ पूरे बैंक खाते से नहीं बल्कि केवल उस राशि से है जो अपराध से जुड़ी हो।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया:

  • पुलिस खाते को फ्रीज़ कर सकती है, लेकिन पूरी राशि नहीं
  • केवल संदिग्ध रकम तक ही कार्रवाई सीमित रहनी चाहिए
  • मजिस्ट्रेट को सूचना देना अनिवार्य है

एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में अदालत ने कहा:

“पूरा बैंक खाता फ्रीज़ करना, जबकि केवल एक सीमित राशि संदिग्ध हो, कानून के दायरे से बाहर है।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि:

  • धारा 106 (Seizure) और धारा 107 (Attachment) अलग-अलग हैं
  • धारा 106 के तहत केवल अस्थायी रोक लगाई जा सकती है
  • स्थायी या व्यापक रोक के लिए न्यायिक आदेश आवश्यक है

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अदालत ने निर्देश दिया कि:

  1. बैंक केवल संदिग्ध राशि पर ही lien (रोक) लगाए
  2. बाकी खाते को तुरंत चालू किया जाए
  3. खाताधारकों को फ्रीज़ की जानकारी दी जाए
  4. जांच एजेंसी स्पष्ट बताए कि कौन-सी राशि संदिग्ध है

इसके साथ ही:

  • अधिकांश याचिकाएं स्वीकार की गईं
  • कुछ याचिकाएं निरर्थक (infructuous) घोषित कर दी गईं
  • एक मामले में विवादित राशि मजिस्ट्रेट के आदेश पर निर्भर रखी गई

Case Details

Case Title: Ashish Rawat vs Union of India & Others (and connected matters)

Case Number: Writ-C No. 1489 of 2026 & batch

Judge: Justice Ajit Kumar & Justice Swarupama Chaturvedi

Decision Date: 08 April 2026

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