कलकत्ता हाई कोर्ट ने Budge Budge Company Limited को राहत देने से इनकार करते हुए उसके खिलाफ पारित बेदखली डिक्री को बरकरार रखा है। अदालत ने माना कि किरायेदारी वैध रूप से समाप्त की गई थी और ट्रायल कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता। इसके साथ ही कंपनी की अपील खारिज कर दी गई।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद 29 अक्टूबर 1973 को हुए एक लीज़ समझौते से जुड़ा है, जिसके तहत Budge Budge Company Limited ने The Calcutta Gujrati Education Society की संपत्ति किराये पर ली थी।
मकान मालिक ने पहले वर्ष 1992 में West Bengal Premises Tenancy Act, 1956 के तहत बेदखली का मुकदमा दायर किया था। बाद में वह मुकदमा वापस ले लिया गया। इसके बाद कुछ महीनों तक पुराने किराये पर भुगतान स्वीकार किया गया और फिर 5 जुलाई 2003 को Transfer of Property Act, 1882 की धारा 106 के तहत नया नोटिस जारी कर किरायेदारी समाप्त कर दी गई।
नोटिस के बावजूद कंपनी ने परिसर खाली नहीं किया, जिसके बाद मकान मालिक ने कब्जा वापस लेने और मेस्ने प्रॉफिट (अनधिकृत कब्जे की अवधि का मुआवजा) की मांग करते हुए नया वाद दायर किया। ट्रायल कोर्ट ने दिसंबर 2024 में मकान मालिक के पक्ष में फैसला सुनाया, जिसे कंपनी ने हाई कोर्ट में चुनौती दी।
कंपनी की दलीलें
अपीलकर्ता कंपनी का कहना था कि 1973 के समझौते के अनुसार उसकी किरायेदारी केवल किराया न चुकाने की स्थिति में ही समाप्त की जा सकती थी, जबकि उसने अगस्त 2003 तक कोई डिफॉल्ट नहीं किया था।
कंपनी ने यह भी तर्क दिया कि पहले मुकदमे के वापस लेने के बाद मकान मालिक द्वारा किराया स्वीकार करना नई किरायेदारी को स्वीकार करने और पुराने नोटिस को छोड़ देने के समान था।
इसके अलावा कंपनी ने कहा कि पहले वाला मुकदमा बाद में पुनर्जीवित हो गया था, इसलिए एक समय दो मुकदमे एक ही संपत्ति को लेकर लंबित रहे। उसने यह आपत्ति भी उठाई कि विवाद व्यावसायिक प्रकृति का था, इसलिए Commercial Courts Act लागू होना चाहिए था।
हाई कोर्ट की टिप्पणियां
डिवीजन बेंच ने ट्रायल कोर्ट की इस राय से सहमति जताई कि पहले की किरायेदारी समाप्त होने के बाद जब मकान मालिक ने किराया स्वीकार किया, तब Transfer of Property Act की धारा 116 के तहत Holding Over के सिद्धांत के अनुसार महीने-दर-महीने नई किरायेदारी अस्तित्व में आ गई।
अदालत ने कहा कि बाद में 5 जुलाई 2003 के नोटिस से उसी नई किरायेदारी को वैध रूप से समाप्त किया गया था।
अदालत ने कहा,
"वर्तमान वाद उसी नई किरायेदारी की समाप्ति पर आधारित है। इसलिए इसका कारण-ए-वाद पहले वाले मुकदमे से अलग है।"
क्या किराया स्वीकार करने से नोटिस खत्म हो गया?
कंपनी का यह भी कहना था कि नोटिस जारी होने के बाद किराया स्वीकार करने से मकान मालिक ने बेदखली नोटिस छोड़ दिया था।
हाई कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि केवल किराया स्वीकार कर लेने से यह नहीं माना जा सकता कि मकान मालिक ने किरायेदारी जारी रखने का इरादा बना लिया था।
बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि सिर्फ किराया स्वीकार करना, अपने-आप में बेदखली नोटिस को समाप्त नहीं करता, जब तक कि मकान मालिक की ऐसी स्पष्ट मंशा साबित न हो।
अदालत ने यह भी पाया कि मुकदमे के दौरान जो भुगतान हुए, वे न्यायालय के आदेशों के अनुसार और दोनों पक्षों के अधिकारों को सुरक्षित रखते हुए स्वीकार किए गए थे। इसलिए उनसे नई किरायेदारी नहीं बनती।
Commercial Courts Act को लेकर उठाई गई आपत्ति पर हाई कोर्ट ने कहा कि यह मुकदमा 2003 में दायर हुआ था, जबकि Commercial Courts Act 2015 में लागू हुआ।
अदालत ने कहा कि मुकदमे की सुनवाई काफी आगे बढ़ चुकी थी और पूरे ट्रायल के दौरान अधिकार क्षेत्र को लेकर कोई आपत्ति नहीं उठाई गई। अपीलकर्ता यह भी नहीं दिखा सका कि इससे उसे कोई वास्तविक नुकसान हुआ है।
इसलिए अदालत ने माना कि बाद में लागू हुआ कानून पहले से लंबित और विधिवत चल रहे मुकदमे को प्रभावित नहीं कर सकता।
फैसला
सभी दलीलों पर विचार करने के बाद कलकत्ता हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में किसी प्रकार की कानूनी या तथ्यात्मक त्रुटि नहीं पाई। अदालत ने बेदखली की डिक्री को बरकरार रखते हुए APD 04 of 2025 को खारिज कर दिया। साथ ही, इससे संबंधित सभी लंबित आवेदन भी निस्तारित कर दिए गए।
Case Details:
Case Title: Budge Budge Company Limited v. The Calcutta Gujrati Education Society & Anr.
Case Number: APD 04 of 2025 (with CS No. 317 of 2003)
Judge: Justice Md. Shabbar Rashidi and Justice Debangsu Basak
Decision Date: 02 July 2026


