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धर्मांतरण मामले में आरोप रद्द करने से हाईकोर्ट का इनकार, कहा- मुकदमा चलाने के लिए प्रथम दृष्टया पर्याप्त आधार मौजूद

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कथित धर्मांतरण मामले में आरोप रद्द करने से इनकार करते हुए कहा कि अभियोजन के पास मुकदमा चलाने के लिए प्रथम दृष्टया पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है। - Jagram and Others v. State of Madhya Pradesh

Zaved Khan
धर्मांतरण मामले में आरोप रद्द करने से हाईकोर्ट का इनकार, कहा- मुकदमा चलाने के लिए प्रथम दृष्टया पर्याप्त आधार मौजूद

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने जगराम और अन्य की ओर से दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाए गए आरोपों को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि जांच के दौरान एकत्रित सामग्री प्रथम दृष्टया मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त है और आरोप तय करने के चरण में साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 20 जून 2025 को देवास जिले के चौबारा जागीर गांव के निवासी गजराज सिंह द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत से जुड़ा है। शिकायत के अनुसार, गांव में आयोजित एक बैठक में कुछ लोगों ने ग्रामीणों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित किया। आरोप था कि धर्म परिवर्तन करने पर मुफ्त इलाज, बच्चों को अच्छी शिक्षा और ₹50,000 देने का आश्वासन दिया गया।

शिकायत के आधार पर थाना सोनकच्छ में अपराध क्रमांक 409/2025 दर्ज किया गया। जांच के दौरान पुलिस ने घटनास्थल का नक्शा तैयार किया, गवाहों के बयान दर्ज किए और कथित प्रचार सामग्री, लाउडस्पीकर तथा मोटरसाइकिल जब्त की। जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम, 2021 की धारा 3 और 5 के तहत आरोपपत्र दाखिल किया।

याचिकाकर्ताओं ने ट्रायल कोर्ट के आरोप तय करने के आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि अधिनियम की धारा 4 के तहत आवश्यक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। उनका यह भी तर्क था कि अधिनियम की धारा 10 में निर्धारित प्रावधानों का पालन नहीं हुआ।

उन्होंने यह भी कहा कि "प्रलोभन" संबंधी आरोप अस्पष्ट हैं और अधिनियम की धारा 2(क) में दी गई परिभाषा के दायरे में नहीं आते। अपनी दलीलों के समर्थन में उन्होंने Toofan Singh v. State of Tamil Nadu तथा A.R. Antulay v. R.S. Nayak सहित सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया।

हाईकोर्ट की टिप्पणियां

न्यायमूर्ति गजेंद्र सिंह ने सबसे पहले उन सिद्धांतों का उल्लेख किया जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने आरोप तय करने के चरण के लिए निर्धारित किया है। अदालत ने कहा कि इस स्तर पर केवल यह देखा जाता है कि अभियोजन के पास मुकदमा आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त सामग्री है या नहीं। साक्ष्यों की विश्वसनीयता या अंतिम परिणाम का परीक्षण इस चरण में नहीं किया जा सकता।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए कहा,

"आरोप तय करने के चरण में मिनी ट्रायल की अनुमति नहीं है।"

शिकायत का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता स्वयं उस बैठक में मौजूद था, जहां कथित रूप से धर्म परिवर्तन के लिए प्रलोभन दिए गए थे। इसलिए धारा 4 के अनुपालन न होने की दलील स्वीकार नहीं की जा सकती।

धारा 10 के संबंध में अदालत ने कहा कि यह प्रावधान उस व्यक्ति पर लागू होता है जो स्वयं धर्म परिवर्तन करना चाहता है। इस धारा के उल्लंघन के लिए अलग से धारा 10(4) के तहत दंड का प्रावधान है। वर्तमान मामले में धारा 10(4) के तहत कोई आरोप तय नहीं किया गया है, इसलिए इस आधार पर अभियोजन को चुनौती नहीं दी जा सकती।

अदालत ने यह भी कहा,

"शिकायत में किए गए आरोपों को यदि प्रथम दृष्टया सही माना जाए तो वे अधिनियम की धारा 2(क) में परिभाषित 'प्रलोभन' के दायरे में आते हैं।"

अदालत ने यह भी नोट किया कि जांच में ऐसी सामग्री सामने आई है जिससे प्रथम दृष्टया यह संकेत मिलता है कि याचिकाकर्ताओं की कथित भूमिका उस बैठक में उपयोग किए गए उपकरण उपलब्ध कराने की थी।

अदालत का फैसला

हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त है। साथ ही, याचिकाकर्ताओं द्वारा उद्धृत सुप्रीम कोर्ट के फैसले इस मामले में उनकी सहायता नहीं करते।

इन्हीं कारणों से अदालत ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया और ट्रायल कोर्ट में मुकदमे की कार्यवाही जारी रखने का मार्ग प्रशस्त किया।

Case Details:

Case Title: Jagram and Others v. State of Madhya Pradesh

Case Number: Criminal Revision No. 555 of 2026

Judge: Justice Gajendra Singh

Decision Date: 29 June 2026

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