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कलकत्ता हाईकोर्ट ने प्रोफेसर के खिलाफ धोखाधड़ी केस रद्द किया, कहा-सबूत केवल शक पैदा करते हैं, मजबूत आरोप नहीं

स्वपन कुमार घोष बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य - कलकत्ता उच्च न्यायालय ने वस्त्र मंत्रालय की अनुसंधान परियोजना से जुड़े कथित जाली वाउचरों के मामले में कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रोफेसर के खिलाफ आपराधिक मामला रद्द कर दिया।

Shivam Y.
कलकत्ता हाईकोर्ट ने प्रोफेसर के खिलाफ धोखाधड़ी केस रद्द किया, कहा-सबूत केवल शक पैदा करते हैं, मजबूत आरोप नहीं

कलकत्ता हाईकोर्ट ने यूनिवर्सिटी ऑफ कलकत्ता के एक प्रोफेसर के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि जांच एजेंसी द्वारा जुटाए गए साक्ष्य केवल संदेह पैदा करते हैं, लेकिन इतने मजबूत नहीं हैं कि मुकदमे को आगे बढ़ाया जाए। अदालत के अनुसार ऐसे मामलों को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला बालीगंज पुलिस स्टेशन के केस नंबर 145/2018 से जुड़ा था। शिकायत यूनिवर्सिटी ऑफ कलकत्ता के जूट एंड फाइबर टेक्नोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर असिस मुखोपाध्याय ने दर्ज कराई थी।

शिकायत में आरोप लगाया गया था कि भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय द्वारा प्रायोजित एक अनुसंधान परियोजना से जुड़े कुछ वाउचर पर डेबाशीष शोम के हस्ताक्षर फर्जी तरीके से किए गए।

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आरोप था कि इन कथित फर्जी वाउचर के आधार पर कुछ राशि बैंक से निकाली गई। शिकायत के बाद पुलिस ने जांच शुरू की और बाद में चार्जशीट दाखिल की।

जांच एजेंसी ने 2023 में पहली चार्जशीट और 2025 में पूरक चार्जशीट दाखिल की, जिसमें कई दस्तावेज और गवाहों के बयान शामिल थे।

जांच के दौरान कई बैंक दस्तावेज, वाउचर और चेक जब्त किए गए। साथ ही हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की तीन अलग-अलग रिपोर्ट भी ली गईं।

रिपोर्टों में कई बार यह कहा गया कि विवादित हस्ताक्षरों के लेखक की पहचान स्पष्ट रूप से तय नहीं की जा सकती।

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कुछ मामलों में विशेषज्ञ ने यह भी कहा कि जिन नमूना हस्ताक्षरों से तुलना की गई, उनसे विवादित हस्ताक्षरों का मेल नहीं बैठता।

जांच में जिन गवाहों के बयान लिए गए, उनमें से कुछ ने कहा कि उन्होंने बैंक से पैसा निकाला था, लेकिन बाद में वह रकम डेबाशीष शोम को दे दी थी।

अदालत ने कहा कि किसी आपराधिक मामले को आगे बढ़ाने के लिए केवल शक काफी नहीं होता, बल्कि मजबूत संदेह या ठोस आधार होना जरूरी है।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि न्यायालय को यह देखना होता है कि जांच से ऐसा कोई मजबूत आधार बनता है या नहीं जिससे मुकदमा चलाया जा सके।

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न्यायमूर्ति तीर्थंकर घोष ने कहा:

“यदि दो संभावित दृष्टिकोण हों और उनमें से एक केवल संदेह पैदा करता हो, तो ऐसे में आरोपी को मुकदमे का सामना करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।”

अदालत ने यह भी नोट किया कि जांच एजेंसी द्वारा जुटाए गए साक्ष्य और गवाहों के बयान परस्पर विरोधाभासी हैं और उनसे भरोसेमंद आधार नहीं बनता।

सभी तथ्यों और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री को देखते हुए अदालत ने कहा कि मामले की कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

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अदालत ने आदेश में कहा:

“ऐसे परिस्थितियों में बालीगंज पुलिस स्टेशन केस नंबर 145/2018 की आगे की कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।”

इसी के साथ हाईकोर्ट ने इस केस से जुड़ी सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द कर दिया और रिवीजन याचिका को स्वीकार कर लिया।

Case Title:- Swapan Kumar Ghosh vs The State of West Bengal & Anr.

Case Number:- C.R.R. 497 of 2021

Judgment Delivered on: 02 March 2026

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