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60% दिव्यांग कर्मचारी की याचिका पर हाईकोर्ट सख्त, मामले को जनहित याचिका में बदला

कुलदीप सिंह भुल्लर बनाम पंजाब कृषि विश्वविद्यालय और अन्य। 60% दिव्यांग कर्मचारी की याचिका पर हाईकोर्ट सख्त, मामला जनहित याचिका बना; राज्यों को पक्षकार बनाने का आदेश।

Vivek G.
60% दिव्यांग कर्मचारी की याचिका पर हाईकोर्ट सख्त, मामले को जनहित याचिका में बदला

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में सोमवार को एक ऐसी याचिका पर सुनवाई हुई, जिसने सिर्फ एक कर्मचारी की परेशानी नहीं बल्कि हजारों दिव्यांग कर्मचारियों के अधिकारों का सवाल खड़ा कर दिया। 60 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता से जूझ रहे याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की कि उसे ऐसा आवास दिया जाए जो उसकी शारीरिक स्थिति के अनुरूप हो और उसमें आवश्यक सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाएं।

कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे व्यापक जनहित से जुड़ा बताया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता कुलदीप सिंह भुल्लर, जिन्हें दाहिने पैर में 60% स्थायी दिव्यांगता प्रमाणित है, ने स्वयं कोर्ट में पेश होकर अपनी बात रखी। मेडिकल रिकॉर्ड के अनुसार उनके दाहिने पैर में कमजोरी, मांसपेशियों की क्षति और जोड़ों में विकृति है।

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उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि उन्हें ऐसा घर आवंटित किया जाए जो उनकी शारीरिक जरूरतों के अनुरूप हो। साथ ही, मौजूदा आवास में आवश्यक बदलाव-जैसे रैंप, आसान आवाजाही की व्यवस्था और अन्य सुगम सुविधाएं-किए जाएं।

याचिका में स्पष्ट रूप से दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के प्रावधानों का हवाला दिया गया।

अदालत की अहम टिप्पणियां

न्यायमूर्ति कुलदीप तिवारी की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान अधिनियम की धारा 40, 44 और 45 का विस्तार से उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि कानून पहले से ही यह सुनिश्चित करता है कि सार्वजनिक भवनों को दिव्यांगजनों के लिए सुलभ बनाया जाए।

पीठ ने कहा, “धारा 40 के तहत केंद्र सरकार को सुगमता के मानक तय करने की जिम्मेदारी दी गई है, जबकि धारा 44 स्पष्ट करती है कि बिना इन मानकों के किसी भवन को अनुमति नहीं दी जा सकती।”

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि धारा 45 के तहत मौजूदा भवनों को तय समय सीमा में सुगम बनाया जाना अनिवार्य है।

सुनवाई के दौरान यह भी बताया गया कि 2017 के नियमों के तहत ‘हॉर्मोनाइज्ड गाइडलाइंस एंड स्पेस स्टैंडर्ड्स’ लागू हैं, जिनमें सार्वजनिक भवनों के लिए बैरियर-फ्री (बाधा रहित) व्यवस्था अनिवार्य की गई है।

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दायरा सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं

कोर्ट ने कहा कि यह मुद्दा केवल एक कर्मचारी तक सीमित नहीं है। आदेश के अनुसार, यह विवाद पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में कार्यरत अन्य दिव्यांग कर्मचारियों के अधिकारों से भी जुड़ा है।

पीठ ने स्पष्ट किया कि “मामले के व्यापक प्रभाव को देखते हुए संबंधित राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश को भी पक्षकार बनाया जाना आवश्यक है।”

इसके तहत पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ के मुख्य सचिवों के साथ-साथ सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को भी प्रतिवादी बनाने का निर्देश दिया गया।

अमिकस क्यूरी की नियुक्ति

याचिकाकर्ता स्वयं अपनी पैरवी कर रहे थे। अदालत ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता क्षितिज शर्मा और अधिवक्ता तहाफ बैंस को अमिकस क्यूरी (न्यायालय मित्र) नियुक्त किया।

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कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि पूरी याचिका की प्रतियां नियुक्त अधिवक्ताओं को उपलब्ध कराई जाएं।

जनहित याचिका के रूप में दर्ज करने का आदेश

सुनवाई के अंत में अदालत ने कहा कि यह मामला बड़े सार्वजनिक हित से जुड़ा है। इसलिए इसे जनहित याचिका (Public Interest Litigation) के रूप में माना जाएगा।

आदेश में कहा गया कि याचिका को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रशासनिक पक्ष पर रखा जाए ताकि इसे संबंधित रोस्टर वाली पीठ को सौंपा जा सके।

24 फरवरी 2026 को पारित इस आदेश के साथ फिलहाल कार्यवाही का यह चरण समाप्त हुआ।

Case Title: Kuldeep Singh Bhullar vs Punjab Agricultural University & Ors.

Case No.: CWP-3200-2026

Decision Date: February 24, 2026

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