झारखंड हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि घरेलू विवाद के दौरान हुई केवल एक बार की गाली-गलौज या कहासुनी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत "क्रूरता" नहीं माना जा सकता, जब तक अभियोजन यह साबित न कर दे कि महिला के साथ लगातार ऐसा व्यवहार किया गया था जिससे वह आत्महत्या करने या गंभीर मानसिक अथवा शारीरिक नुकसान की स्थिति में पहुंच गई हो।
इसी आधार पर अदालत ने धारा 498A के तहत दोषसिद्ध एक महिला को बरी कर दिया और ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
मामले की शुरुआत वर्ष 2001 की एक घटना से हुई। अभियोजन के अनुसार, घर में रखे गए गुड़ (treacle) को हटाने को लेकर विवाद हुआ, जिसके बाद सास और बहू के बीच कहासुनी हुई। आरोप था कि इस घटना से आहत होकर बहू ने अपने ऊपर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा ली। बाद में इलाज के दौरान उसकी मृत्यु हो गई।
पुलिस ने पहले धारा 498A के तहत मामला दर्ज किया और मृत्यु के बाद धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाने) का आरोप भी जोड़ा। ट्रायल कोर्ट ने धारा 306 से आरोपमुक्त करते हुए धारा 498A के तहत महिला को दोषी ठहराया और तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ हाई कोर्ट में अपील दायर की गई।
न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का विस्तृत परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि कई गवाह अभियोजन के पक्ष का समर्थन नहीं कर सके और रिकॉर्ड में ऐसी कोई ठोस सामग्री नहीं थी जिससे यह साबित हो कि मृतका के साथ लगातार क्रूरता या उत्पीड़न किया गया था।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से केवल घटना वाले दिन हुए एक विवाद और कथित अपशब्दों का पता चलता है। इससे धारा 498A के आवश्यक तत्व स्वतः सिद्ध नहीं हो जाते।
पीठ ने कहा,
"भारतीय संयुक्त परिवारों में घरेलू विवाद या सास-बहू के बीच सामान्य कहासुनी होना असामान्य नहीं है। जब तक ऐसा व्यवहार इतना गंभीर और लगातार न हो कि वह महिला को आत्महत्या जैसे कदम उठाने के लिए मजबूर कर दे, तब तक उसे कानून में 'क्रूरता' नहीं माना जा सकता।"
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 498A तभी लागू होती है जब अभियोजन यह साबित करे कि महिला के साथ ऐसा जानबूझकर किया गया व्यवहार हुआ जिससे उसके जीवन, स्वास्थ्य या मानसिक स्थिति पर गंभीर प्रभाव पड़ा हो, या उसे अवैध दहेज अथवा संपत्ति की मांग के लिए प्रताड़ित किया गया हो।
पीठ ने कहा,
"अभियोजन धारा 498A के आवश्यक तत्वों को साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है।"
सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद झारखंड हाई कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया था। इसलिए धारा 498A के तहत दर्ज दोषसिद्धि और सजा को कानून के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया, महिला को सभी आरोपों से बरी कर दिया तथा उसके जमानत बंधपत्र से भी मुक्त कर दिया। लंबित सभी आवेदन भी निस्तारित कर दिए गए।
Case Details
Case Title: X v. State of Jharkhand
Case Number: Criminal Appeal (SJ) No. 869 of 2005
Judge: Justice Pradeep Kumar Srivastava
Decision Date: June 30, 2026

