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पॉक्सो मामले में आरोपी को जमानत: गवाहों के विरोध और आयु विवाद के बीच हाई कोर्ट का फैसला

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के हाई कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट के एक मामले में मंजूर अहमद खुरू को जमानत दे दी, क्योंकि मुख्य गवाहों ने अपने बयान वापस ले लिए और पीड़िता की आयु पर सवाल उठाए गए। कोर्ट के तर्क और विस्तृत कानूनी विश्लेषण को यहां जानें।

Shivam Y.
पॉक्सो मामले में आरोपी को जमानत: गवाहों के विरोध और आयु विवाद के बीच हाई कोर्ट का फैसला

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के हाई कोर्ट (श्रीनगर) ने हाल ही में पॉक्सो एक्ट और अन्य दंड प्रावधानों के तहत गंभीर आरोपों में घिरे आरोपी मंजूर अहमद खुरू को जमानत दे दी। 1 अगस्त, 2025 को सुनाए गए इस फैसले में कोर्ट ने सबूतों की जांच की, जिसमें मुख्य गवाहों के विरोधी बयान और पीड़िता की आयु को लेकर विवाद शामिल था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला एफआईआर नंबर 223/2024 से उपजा है, जो अनंतनाग पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई थी। पीड़िता के पिता ने आरोप लगाया था कि उनकी बेटी, जो 10वीं कक्षा की छात्रा है, को एक अज्ञात व्यक्ति ने यौन शोषण किया, जिसके परिणामस्वरूप वह गर्भवती हो गई। बाद में आरोपी के रूप में मंजूर अहमद खुरू की पहचान की गई। आरोपों में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 137(2), 64 और 89 तथा पॉक्सो एक्ट की धारा 5(ii) और 6 शामिल थीं।

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जांच के दौरान, पीड़िता ने बताया कि खुरू, जो अनंतनाग में डीसी कार्यालय के पास एक होटल चलाता है, ने उसे जबरन अपने घर ले जाकर यौन शोषण किया। हालांकि, ट्रायल के दौरान उसने अपना बयान वापस ले लिया और कहा कि वह परिवारिक दोस्ती के कारण आरोपी को बचा रही थी। उसके माता-पिता ने भी अभियोजन के मामले का समर्थन नहीं किया, जिससे आरोपों पर सवाल उठ गया।

कोर्ट ने जमानत आवेदन पर विचार करते हुए निम्नलिखित सिद्धांतों को रेखांकित किया:

1. आरोप की प्रकृति और गंभीरता: पॉक्सो एक्ट के तहत लगे गंभीर आरोप एक प्रमुख कारक थे।

2. गवाहों की विश्वसनीयता: कोर्ट ने पीड़िता और उसके माता-पिता के विरोधी रुख को नोट किया, जिससे अभियोजन का मामला कमजोर हो गया।

3. सबूतों में हस्तक्षेप का जोखिम: चूंकि अधिकांश महत्वपूर्ण गवाह पहले ही अपना बयान दे चुके थे, इसलिए कोर्ट ने सबूतों में हस्तक्षेप का कोई जोखिम नहीं पाया।

4. आयु विवाद: बचाव पक्ष ने पीड़िता की आयु पर सवाल उठाए, उसके बयान और उसके माता-पिता के बयान का हवाला दिया, जो अभियोजन के इस दावे का खंडन करते थे कि वह नाबालिग थी।

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कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट की धारा 29 और 30 का उल्लेख किया, जो आरोपी के खिलाफ अपराध और दोषपूर्ण मानसिक स्थिति की धारणाएं बनाती हैं। हालांकि, कोर्ट ने जोर देकर कहा कि ये धारणाएं खंडनीय हैं। इस मामले में, विरोधी गवाहों और आयु विवाद ने इन धारणाओं को खारिज करने के लिए पर्याप्त आधार प्रदान किया, जिससे जमानत देने का निर्णय लिया गया।

न्यायमूर्ति संजय धर ने कहा कि ट्रायल के दौरान पीड़िता और उसके माता-पिता ने अभियोजन के मामले का समर्थन नहीं किया। इसके अलावा, बचाव पक्ष ने पीड़िता की आयु पर सफलतापूर्वक सवाल उठाया, जो पॉक्सो एक्ट को लागू करने के लिए महत्वपूर्ण था। कोर्ट ने यह भी माना कि अधिकांश गवाह पहले ही जांचे जा चुके थे, जिससे सबूतों में हस्तक्षेप का जोखिम कम हो गया था।

"मामले की गुणवत्ता पर टिप्पणी किए बिना, कोर्ट ने आवेदक के तर्कों में प्राथमिक तौर पर दम पाया। पॉक्सो एक्ट के तहत दोष की धारणा को खारिज कर दिया गया, और कोई सबूत नहीं था कि आरोपी अपराध दोहराएगा या न्याय से भागेगा।"

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कोर्ट ने खुरू को निम्नलिखित शर्तों पर जमानत दी:

1. उसे 50,000 रुपये का व्यक्तिगत बॉन्ड और समान राशि का एक जमानतदार पेश करना होगा।

2. उसे हर सुनवाई में कोर्ट में उपस्थित होना होगा।

3. वह ट्रायल कोर्ट की अनुमति के बिना जम्मू-कश्मीर की सीमा नहीं छोड़ सकता।

4. उसे अभियोजन के गवाहों के साथ छेड़छाड़ नहीं करनी होगी।

केस का शीर्षक: मंज़ूर अहमद खुरू बनाम जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश और अन्य

केस संख्या: ज़मानत आवेदन संख्या 84/2025

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