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मद्रास हाईकोर्ट ने ट्रांसजेंडर एमबीबीएस स्नातक के दस्तावेज लौटाने का आदेश दिया, विश्वविद्यालय को समिति बनाने का निर्देश

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मद्रास हाईकोर्ट ने ट्रांसजेंडर एमबीबीएस स्नातक के दस्तावेज लौटाने का आदेश दिया, विश्वविद्यालय को समिति बनाने का निर्देश

मद्रास हाईकोर्ट ने पेराम्बलूर स्थित एक निजी मेडिकल कॉलेज को कड़ी फटकार लगाते हुए आदेश दिया है कि ट्रांसजेंडर एमबीबीएस स्नातक विजनेश डी. के सभी मूल शैक्षणिक प्रमाणपत्र तुरंत लौटाए जाएं। जस्टिस जी.के. इलंथिरैयन की एकल पीठ ने यह भी कहा कि तमिलनाडु डॉ. एम.जी.आर. मेडिकल यूनिवर्सिटी को 12 हफ्तों के भीतर ट्रांसजेंडर छात्रों के लिए शिकायत निवारण समिति गठित करनी होगी।

पृष्ठभूमि

विजनेश, जो एक ट्रांसजेंडर छात्र हैं, ने एनईईटी-यूजी परीक्षा पास करने के बाद तेलुगु अल्पसंख्यक प्रबंधन कोटे के तहत धनलक्ष्मी श्रीनिवासन मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया। याचिका के अनुसार, पूरी फीस जमा करने के बावजूद कॉलेज ने बार-बार अतिरिक्त राशि की मांग की। इतना ही नहीं, पाँच साल की पढ़ाई के दौरान छात्र को भेदभाव का सामना करना पड़ा। उन्हें जेंडर-न्यूट्रल हॉस्टल सुविधा नहीं दी गई और इंटर्नशिप लॉगबुक व बोनाफाइड सर्टिफिकेट जैसे जरूरी दस्तावेज देने से भी इनकार कर दिया गया।

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पढ़ाई पूरी करने और नेशनल मेडिकल कमीशन से डिग्री प्रमाणपत्र हासिल करने के बावजूद कॉलेज ने मूल स्कूल प्रमाणपत्र यह कहकर रोक लिए कि बकाया फीस है। विजनेश का तर्क था कि यह न केवल ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 का उल्लंघन है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के 2014 के नालसा फैसले की अवमानना भी है, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की गरिमा और पहचान के अधिकार को मान्यता दी गई थी।

जस्टिस इलंथिरैयन ने साफ कहा कि शैक्षणिक संस्थान छात्रों के प्रमाणपत्रों को फीस वसूली का साधन नहीं बना सकते। अदालत ने टिप्पणी की, “शैक्षणिक दस्तावेज हर छात्र की अमूल्य संपत्ति हैं। नौवें प्रतिवादी कॉलेज को इन्हें रोकने का कोई अधिकार नहीं था।”

भेदभाव के मुद्दे पर अदालत ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 3 और 13 का हवाला दिया, जिसमें शिक्षा में किसी भी तरह के भेदभाव पर रोक और समावेशी सुविधाएँ उपलब्ध कराना अनिवार्य किया गया है। अदालत ने 2020 के नियमों की ओर भी इशारा किया, जिनके तहत जेंडर-न्यूट्रल शौचालय और शिकायत समिति अनिवार्य है। अदालत ने कहा, ऐसी समिति का अभाव कानून का उल्लंघन है।

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सुनवाई के दौरान कॉलेज की ओर से यह कहा गया कि अब वे सभी प्रमाणपत्र लौटाने और फीस की कथित बकाया राशि माफ करने के लिए तैयार हैं।

8 सितंबर 2025 को दिए आदेश में हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि विजनेश एक हफ्ते के भीतर कॉलेज से संपर्क करें और कॉलेज को बाध्य किया गया कि वह “बकाया फीस को माफ कर तत्काल सभी मूल प्रमाणपत्र और दस्तावेज लौटा दे।” इसके अलावा, तमिलनाडु डॉ. एम.जी.आर. मेडिकल यूनिवर्सिटी को आदेश दिया गया कि वह 12 हफ्तों के भीतर ट्रांसजेंडर छात्रों के लिए शिकायत निवारण समिति गठित करे।

इन निर्देशों के साथ अदालत ने पाँचों रिट याचिकाओं का निपटारा कर दिया।

केस संख्या: डब्ल्यूपी सं. 26062, 26065, 26068, 26071 एवं 26074 / 2025

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