मेन्यू
समाचार खोजें...
होमSaved

मामूली विसंगतियां और FIR दर्ज करने में देरी अभियोजन पक्ष के मामले को कमजोर नहीं करतीं: सर्वोच्च न्यायालय ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक विश्वसनीय गवाह की गवाही पर भी सजा बरकरार रह सकती है और पिता-पुत्र की उम्रकैद के खिलाफ अपील खारिज कर दी। - अदालत यादव और अन्य बनाम बिहार राज्य

Rajan Prajapati
मामूली विसंगतियां और FIR दर्ज करने में देरी अभियोजन पक्ष के मामले को कमजोर नहीं करतीं: सर्वोच्च न्यायालय ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा।

सर्वोच्च न्यायालय ने 22 अप्रैल, 2026 को एक अहम फैसले में स्पष्ट किया कि यदि किसी एक गवाह की गवाही भरोसेमंद और ठोस हो, तो उसी के आधार पर दोषसिद्धि कायम रखी जा सकती है। अदालत ने हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए पिता-पुत्र की अपील खारिज कर दी।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला बिहार के बेगूसराय का है, जहां 4 दिसंबर 2008 को एक व्यक्ति की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। आरोप था कि मृतक एक पुराने आपराधिक मामले में गवाह था और इसी वजह से उसे निशाना बनाया गया।

ट्रायल कोर्ट ने चार आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा दी थी। बाद में हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। इसके खिलाफ दोषी पिता-पुत्र ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने कई तर्क रखे जैसे एफआईआर में देरी, घटनास्थल को लेकर विरोधाभास, और मेडिकल व मौखिक साक्ष्य में अंतर।

लेकिन अदालत ने इन तर्कों को पर्याप्त नहीं माना।  न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिस्वर सिंह की पीठ ने कहा कि:

“कानून में गवाहों की संख्या नहीं, बल्कि उनकी गुणवत्ता महत्वपूर्ण होती है।”

कोर्ट ने विशेष रूप से शिकायतकर्ता (PW-5) की गवाही पर भरोसा जताया, जो खुद भी घायल था।

अदालत ने कहा कि एक “स्टर्लिंग गवाह” (बेहद भरोसेमंद गवाह) की गवाही अकेले भी सजा के लिए पर्याप्त हो सकती है, यदि वह सुसंगत और विश्वसनीय हो।

एफआईआर में देरी के मुद्दे पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:

“सिर्फ देरी के आधार पर पूरे मामले को खारिज नहीं किया जा सकता, यदि उसका संतोषजनक स्पष्टीकरण हो।”

मेडिकल और प्रत्यक्षदर्शी गवाही में कथित अंतर को भी अदालत ने महत्वहीन माना, क्योंकि दोनों इस बात पर सहमत थे कि गोली सिर पर लगी थी।

अदालत ने यह भी कहा कि:

  • घायल गवाह की गवाही को अधिक महत्व दिया जाता है
  • स्वतंत्र गवाहों की अनुपस्थिति से अभियोजन का मामला कमजोर नहीं होता
  • एक विश्वसनीय गवाह के आधार पर दोषसिद्धि पूरी तरह वैध है

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष का मामला संदेह से परे साबित हुआ है।

“संपूर्ण परिस्थितियों को देखते हुए अपील में कोई दम नहीं है,” अदालत ने कहा।

अदालत ने पिता-पुत्र की अपील खारिज करते हुए उनकी सजा को बरकरार रखा।

Case Details:

Case Title: Adalat Yadav & Anr. vs State of Bihar

Case Number: Criminal Appeal Nos. 1788–1789 of 2019

Judges: Justice Sanjay Karol, Justice Nongmeikapam Kotiswar Singh

Decision Date: April 22, 2026

Mobile App

Take CourtBook Everywhere

Access your account on the go with our mobile app.

Install App
CourtBook Mobile App

More Stories